Ayodhya Kanda

Sarga 105: Bharata's lamentation and Rama's consolation.

अयोध्याकाण्डम् · सर्ग 105

43 shlokas

ShlokaShloka 1
ततः पुरुषसिंहानां वृतानां तै स्सुहृद्गणैः। शोचतामेव रजनी दुःखेन व्यत्यवर्तत।।2.105.1।।
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वहाँ आकर सभी चुपचाप बैठ गये। कोई कुछ नहीं बोल रहा था। तब सुहृदों के बीच में बैठे हुए भरत ने श्रीराम से इस प्रकार कहा—
Show English Translation
That night passed off painfully for the four lion like brothers as they lamented, surrounded by their hosts of friends.
ShlokaShloka 2
रजन्यां सुप्रभातायां भ्रातरस्ते सुहृद्वृताः। मन्दाकिन्यां हुतं जप्यं कृत्वा राममुपागमन्।।2.105.2।।
हिन्दी अर्थ देखें
वहाँ आकर सभी चुपचाप बैठ गये। कोई कुछ नहीं बोल रहा था। तब सुहृदों के बीच में बैठे हुए भरत ने श्रीराम से इस प्रकार कहा—
Show English Translation
When the night dawned, those brothers surrounded by their friends made (morning) ablutions and, after the prayers, returned to Rama.
ShlokaShloka 3
तूष्णीं ते समुपासीना न कश्चित्किञ्चिदब्रवीत्। भरतस्तु सुहृन्मध्ये रामं वचनमब्रवीत्।।2.105.3।।
हिन्दी अर्थ देखें
वहाँ आकर सभी चुपचाप बैठ गये। कोई कुछ नहीं बोल रहा था। तब सुहृदों के बीच में बैठे हुए भरत ने श्रीराम से इस प्रकार कहा—
Show English Translation
All of them sat together silently and no one uttered a word. Bharata alone from among them addressed Rama saying:
ShlokaShloka 4
सान्त्विता मामिका माता दत्तं राज्यमिदं मम। तद्ददामि तवैवाहं भुङ्क्ष्व राज्यमकण्टकम्।।2.105.4।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘भैया ! पिताजीने वरदान देकर मेरी माता को संतुष्ट कर दिया और माता ने यह राज्य मुझे दे दिया। अब मैं अपनी ओर से यह अकण्टक राज्य आपकी ही सेवा में समर्पित करता हूँ। आप इसका पालन एवं उपभोग कीजिये
Show English Translation
This kingdom was given to me for the satisfaction of my mother. I am bestowing it back on you. Enjoy it without any obstacles.
ShlokaShloka 5
महतेवाम्बुवेगेन भिन्नस्सेतुर्जलागमे। दुरावारं त्वदन्येन राज्यखण्डमिदं महत्।।2.105.5।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘वर्षाकाल में जल के महान् वेग से टूटे हुए सेतु की भाँति इस विशाल राज्यखण्ड को सँभालना आपके सिवा दूसरे के लिये अत्यन्त कठिन है
Show English Translation
Like a dyke bursts under pressure by the great surge of waters during the rainy season, this vast kingdom cannot be sustained by any one except yourself.
ShlokaShloka 6
गतिं खर इवाश्वस्य तार्क्ष्यस्येव पतत्रिणः। अनुगन्तुं न शक्तिर्मे गतिं तव महीपते।।2.105.6।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘पृथ्वीनाथ! जैसे गदहा घोड़े की और अन्य साधारण पक्षी गरुड़ की चाल नहीं चल सकते, उसी प्रकार मुझमें आपकी गतिका—आपकी पालनपद्धति का अनुसरण करने की शक्ति नहीं है
Show English Translation
O lord of the earth as an ass cannot follow the pace of a horse or a bird, the pace of Tarkshya (Garuda), I do not have the capability to follow you.
ShlokaShloka 7
सुजीवं नित्यशस्तस्य यः परैरुपजीव्यते। राम तेन तु दुर्जीवं यः परानुपजीवति।।2.105.7।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘श्रीराम ! जिसके पास आकर दूसरे लोग जीवननिर्वाह करते हैं, उसीका जीवन उत्तम है और जो दूसरों का आश्रय लेकर जीवन निर्वाह करता है, उसका जीवन दुःखमय है (अतः आपके लिये राज्य करना ही उचित है)
Show English Translation
O Rama, the life of a man on whom others depend for their sustenance is a happy life and the life of one who depends on others for his own mintenance is miserable.
ShlokaShloka 8
यथा तु रोपितो वृक्षः पुरुषेण विवर्धितः। ह्रस्वकेण दुरारोहो रूढस्कन्धो महाद्रुमः।।2.105.8।। स यदा पुष्पितो भूत्वा फलानि न विदर्शयेत्। स तां नानुभवेत्प्रीतिं यस्य हेतोः प्ररोपितः।।2.105.9।। एषोपमा महाबाहो तमर्थं वेत्तु मर्हसि। यदि त्वमस्मान्वृषभो भर्ता भृत्यान्न शाधि हि।।2.105.10।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘जैसे फल की इच्छा रखने वाले किसी पुरुष ने एक वृक्ष लगाया, उसे पाल-पोसकर बड़ा किया; फिर उसके तने मोटे हो गये और वह ऐसा विशाल वृक्ष हो गया कि किसी नाटे कद के पुरुष के लिये उस पर चढ़ना अत्यन्त कठिन था। उस वृक्ष में जब फूल लग जायँ, उसके बाद भी यदि वह फल न दिखा सके तो जिसके लिये उस वृक्ष को लगाया गया था, वह उद्देश्य पूरा न हो सका। ऐसी स्थिति में उसे लगाने वाला पुरुष उस प्रसन्नता का अनुभव नहीं करता, जो फल की प्राप्ति होने से सम्भावित थी। महाबाहो ! यह एक उपमा है, इसका अर्थ आप स्वयं समझ लें (अर्थात् पिताजी ने आप-जैसे सर्वसद्गुण सम्पन्न पुत्र को लोकरक्षा के लिये उत्पन्न किया था। यदि आपने राज्यपालन का भार अपने हाथ में नहीं लिया तो उनका वह उद्देश्य व्यर्थ हो जायगा)। इस राज्यपालन के अवसर पर आप श्रेष्ठ एवं भरण-पोषण में समर्थ होकर भी यदि हम भृत्यों का शासन नहीं करेंगे तो पूर्वोक्त उपमा ही आपके लिये लागू होगी
Show English Translation
O mightyarmed Rama, a man plants a tree, rears it till it grows into such a large tree with a big trunk that it becomes difficult for a dwarf to climb. When the tree flowers but does not bear fruit, the man who planted it gets no pleasure out of the purpose for which the tree was planted. Being a mighty protector, do not chastise us who are your servants. This is a simile. You may better comprehend its implications. (The meaning of the simile is that if you do not assume the throne, the desire of our father, who nurtured you right from your childhood and hoped that one day you will become king and rule the people, will be in vain.)
ShlokaShloka 9
श्रेणयस्त्वां महाराज पश्यन्त्वग्य्राश्च सर्वशः। प्रतपन्तमिवादित्यं राज्ये स्थित मरिन्दमम्।।2.105.11।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘जैसे फल की इच्छा रखने वाले किसी पुरुष ने एक वृक्ष लगाया, उसे पाल-पोसकर बड़ा किया; फिर उसके तने मोटे हो गये और वह ऐसा विशाल वृक्ष हो गया कि किसी नाटे कद के पुरुष के लिये उस पर चढ़ना अत्यन्त कठिन था। उस वृक्ष में जब फूल लग जायँ, उसके बाद भी यदि वह फल न दिखा सके तो जिसके लिये उस वृक्ष को लगाया गया था, वह उद्देश्य पूरा न हो सका। ऐसी स्थिति में उसे लगाने वाला पुरुष उस प्रसन्नता का अनुभव नहीं करता, जो फल की प्राप्ति होने से सम्भावित थी। महाबाहो ! यह एक उपमा है, इसका अर्थ आप स्वयं समझ लें (अर्थात् पिताजी ने आप-जैसे सर्वसद्गुण सम्पन्न पुत्र को लोकरक्षा के लिये उत्पन्न किया था। यदि आपने राज्यपालन का भार अपने हाथ में नहीं लिया तो उनका वह उद्देश्य व्यर्थ हो जायगा)। इस राज्यपालन के अवसर पर आप श्रेष्ठ एवं भरण-पोषण में समर्थ होकर भी यदि हम भृत्यों का शासन नहीं करेंगे तो पूर्वोक्त उपमा ही आपके लिये लागू होगी
Show English Translation
O great king and subduer of enemies, may all the leading guilds of traders and other subjects behold you all over installed in the kingdom like the resplendent Sun.
ShlokaShloka 10
तवानुयाने काकुत्स्थ मत्ता नर्दन्तु कुञ्जराः। अन्तःपुरगता नार्यो नन्दन्तु सुसमाहिताः।।2.105.12।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘जैसे फल की इच्छा रखने वाले किसी पुरुष ने एक वृक्ष लगाया, उसे पाल-पोसकर बड़ा किया; फिर उसके तने मोटे हो गये और वह ऐसा विशाल वृक्ष हो गया कि किसी नाटे कद के पुरुष के लिये उस पर चढ़ना अत्यन्त कठिन था। उस वृक्ष में जब फूल लग जायँ, उसके बाद भी यदि वह फल न दिखा सके तो जिसके लिये उस वृक्ष को लगाया गया था, वह उद्देश्य पूरा न हो सका। ऐसी स्थिति में उसे लगाने वाला पुरुष उस प्रसन्नता का अनुभव नहीं करता, जो फल की प्राप्ति होने से सम्भावित थी। महाबाहो ! यह एक उपमा है, इसका अर्थ आप स्वयं समझ लें (अर्थात् पिताजी ने आप-जैसे सर्वसद्गुण सम्पन्न पुत्र को लोकरक्षा के लिये उत्पन्न किया था। यदि आपने राज्यपालन का भार अपने हाथ में नहीं लिया तो उनका वह उद्देश्य व्यर्थ हो जायगा)। इस राज्यपालन के अवसर पर आप श्रेष्ठ एवं भरण-पोषण में समर्थ होकर भी यदि हम भृत्यों का शासन नहीं करेंगे तो पूर्वोक्त उपमा ही आपके लिये लागू होगी
Show English Translation
O Rama, let the elephants following you, intoxicated with ichor, be heard trumpeting. Let the women of the inner apartment rejoice with composed minds (when they hear of your return).
ShlokaShloka 11
तस्य साध्वित्यमन्यन्त नागरा विविधा जनाः। भरतस्य वच श्श्रुत्वा रामं प्रत्यनुयाचतः।।2.105.13।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘ककुत्स्थकुलभूषण! इस प्रकार आपके अयोध्या वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, "अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या"और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन (लगभग १४४ कि.मी) लम्बाई अाैर तीन योजन (लगभग ३६ कि.मी.) चौड़ाई में बसी थी । कई शताब्दी तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। " href="https://www.ramcharit.in/glossary/%e0%a4%85%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/" data-gt-translate-attributes='[{"attribute":"data-cmtooltip", "format":"html"}]' tabindex='0' role='link'>अयोध्या को लौटते समय मतवाले हाथी गर्जना करें और अन्तःपुर की स्त्रियाँ एकाग्रचित्त होकर प्रसन्नतापूर्वक आपका अभिनन्दन करें’
Show English Translation
Hearing the words of Bharata beseeching Rama to return, various classes of people of the city of Ayodhya, in approbation exclaimed well said.
ShlokaShloka 12
तमेवं दुःखितं प्रेक्ष्य विलपन्तं यशस्विनम्। रामः कृतात्मा भरतं समाश्वासयदात्मवान्।।2.105.14।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘ककुत्स्थकुलभूषण! इस प्रकार आपके अयोध्या वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, "अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या"और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन (लगभग १४४ कि.मी) लम्बाई अाैर तीन योजन (लगभग ३६ कि.मी.) चौड़ाई में बसी थी । कई शताब्दी तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। " href="https://www.ramcharit.in/glossary/%e0%a4%85%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/" data-gt-translate-attributes='[{"attribute":"data-cmtooltip", "format":"html"}]' tabindex='0' role='link'>अयोध्या को लौटते समय मतवाले हाथी गर्जना करें और अन्तःपुर की स्त्रियाँ एकाग्रचित्त होकर प्रसन्नतापूर्वक आपका अभिनन्दन करें’
Show English Translation
Having seen the illustrious Bharata lamenting that way, Rama, a man of firm determination and selfpossession, consoled him thus:
ShlokaShloka 13
नाऽत्मनः कामकारोऽस्ति पुरुषोऽयमनीश्वरः। इतश्चेतरतश्चैनं कृतान्तः परिकर्षति।।2.105.15।।
हिन्दी अर्थ देखें
इस प्रकार श्रीराम से राज्य-ग्रहण के लिये प्रार्थना करते हुए भरतजी की बात सुनकर नगर के भिन्न-भिन्न मनुष्यों ने उसका भलीभाँति अनुमोदन किया
Show English Translation
A man is neither independent nor competent to do any act on his free will. Fate pulls him this way or the other.
ShlokaShloka 14
सर्वे क्षयान्ताः निचयाः पतनान्ता समुच्छ्रयाः। संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम्।।2.105.16।।
हिन्दी अर्थ देखें
तब शिक्षित बुद्धिवाले अत्यन्त धीर भगवान् श्रीरामने यशस्वी भरत को इस तरह दुःखी हो विलाप करते देख उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा-
Show English Translation
All accumulations of wealth deplete at the end. Every man who attains elevated positions falls at the end. Every union culminates in separation. Every life ends in death.
ShlokaShloka 15
यथा फलानां पक्वानां नान्यत्र पतनाद्भयम्। एवं नरस्य जातस्य नान्यत्र मरणाद्भयम्।।2.105.17।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘भाई! यह जीव ईश्वर के समान स्वतन्त्र नहीं है, अतः कोई यहाँ अपनी इच्छा के अनुसार कुछ नहीं कर सकता। काल इस पुरुष को इधर-उधर खींचता रहता है
Show English Translation
The only fear of a ripened fruit is the fear of falling down (from the tree). In the same way every man who is born has no other fear except the fear of death.
ShlokaShloka 16
यथाऽगारं दृढस्थूणं जीर्णं भूत्वाऽवसीदति। तथैव सीदन्ति नरा जरामृत्युवशं गताः।।2.105.18।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘समस्त संग्रहों का अन्त विनाश है। लौकिक उन्नतियों का अन्त पतन है। संयोग का अन्त वियोग है और जीवन का अन्त मरण है
Show English Translation
Even a house constructed with sturdy pillars gets dilapidated and ultimately decays. In the same way people under the sway of old age and death are destroyed (at last).
ShlokaShloka 17
अत्येति रजनी या तु सा न प्रतिनिवर्तते। यात्येव यमुना पूर्णा समुद्रमुदकाकुलम्।।2.105.19।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘जैसे सुदृढ़ खम्भेवाला मकान भी पुराना होने पर गिर जाता है, उसी प्रकार मनुष्य जरा और मृत्यु के वश में पड़कर नष्ट हो जाते हैं
Show English Translation
A night that once passe off does not return like the waters of river Yamuna that flow into the ocean filled with water (the water do not flow back into Yamuna).
ShlokaShloka 18
अहोरात्राणि गच्छन्ति सर्वेषां प्राणिनामिह। अायूंषि क्षपयन्त्याशु ग्रीष्मे जलमिवांशवः।।2.105.20।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘जैसे सुदृढ़ खम्भेवाला मकान भी पुराना होने पर गिर जाता है, उसी प्रकार मनुष्य जरा और मृत्यु के वश में पड़कर नष्ट हो जाते हैं
Show English Translation
The passing days and nights quickly decrease the life span of all living beings in this world, like sunrays drying up the water in summer.
ShlokaShloka 19
आत्मानमनुशोच त्वं किमन्यमनुशोचसि। आयुस्ते हीयते यस्य स्थितस्य च गतस्य च।।2.105.21।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘जो रात बीत जाती है, वह लौटकर फिर नहीं आती है। जैसे यमुना जल से भरे हुए समुद्र की ओर जाती ही है, उधर से लौटती नहीं
Show English Translation
Whether you are static or moving, your lifespan decreases. Therefore, you should only grieve about yourself and not for any one else.
ShlokaShloka 20
सहैव मृत्युर्व्रजति सह मृत्युर्निषीदति। गत्वासुदीर्घमध्वानं सहमृत्युर्निवर्तते।।2.105.22।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘दिन-रात लगातार बीत रहे हैं और इस संसार में सभी प्राणियों की आयुका तीव्र गति से नाश कर रहे हैं। ठीक वैसे ही जैसे सूर्य की किरणें ग्रीष्म-ऋतु में जल को शीघ्रतापूर्वक सोखती रहती हैं
Show English Translation
Death follows a man wherever he goes. When he sits, death sits with him. Even after travelling a very long distance, the man returns along with death.
ShlokaShloka 21
गात्रेषु वलयः प्राप्ता श्श्वेताश्चैव शिरोरुहाः। जरया पुरुषो जीर्णः किं हि कृत्वा प्रभावयेत्।।2.105.23।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘तुम अपने ही लिये चिन्ता करो, दूसरे के लिये क्यों बार-बार शोक करते हो। कोई इस लोक में स्थित हो या अन्यत्र गया हो, जिस किसीकी भी आयु तो निरन्तर क्षीण ही हो रही है
Show English Translation
Wrinkels form on the body and hair turns grey in old age. In this way, decayed with age, what can a man do to have control over death.
ShlokaShloka 22
नन्दन्त्युदित आदित्ये नन्दन्त्यस्तमितेऽहनि। आत्मनो नावबुध्यन्ते मनुष्या जीवितक्षयम्।।2.105.24।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘मृत्यु साथ ही चलती है, साथ ही बैठती है और बहुत बड़े मार्ग की यात्रा में भी साथ ही जाकर वह मनुष्य के साथ ही लौटती है
Show English Translation
People rejoice when the Sun rises and rejoice when the Sun sets. But they are unaware of the decline of the life span of their own.
ShlokaShloka 23
हृष्यन्त्यृतुमुखं दृष्ट्वा नवं नवमिहागतम्। ऋतूनां परिवर्तेन प्राणिनां प्राणसङ्क्षयः।।2.105.25।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘शरीर में झुर्रियाँ पड़ गयीं, सिर के बाल सफेद हो गये। फिर जरावस्था से जीर्ण हुआ मनुष्य कौन-सा उपाय करके मृत्यु से बचने के लिये अपना प्रभाव प्रकट कर सकता है ?
Show English Translation
At the advent of each new season men feel delighted to see the newly blossomed flowers and fruits. But with the change of the scasons the life span also diminishes.
ShlokaShloka 24
यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयातां महार्णवे। समेत्य च व्यपेयातां कालमासाद्य कञ्चन।।2.105.26।। एवं भार्याश्चपुत्राश्च ज्ञातयश्च धनानि च। समेत्य व्यवधावन्ति ध्रुवो ह्येषां विनाभवः।।2.105.27।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘लोग सूर्योदय होने पर प्रसन्न होते हैं, सूर्यास्त होने पर भी खुश होते हैं; किंतु यह नहीं जानते कि प्रतिदिन अपने जीवन का नाश हो रहा है।
Show English Translation
In a mighty ocean, two pieces of logs meet one another, float together and in due course get separated. In the same way wives, sons, relatives and riches remain together for some time and thereafter get separated. Their separation is certain.
ShlokaShloka 25
यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयातां महार्णवे। समेत्य च व्यपेयातां कालमासाद्य कञ्चन।।2.105.26।। एवं भार्याश्चपुत्राश्च ज्ञातयश्च धनानि च। समेत्य व्यवधावन्ति ध्रुवो ह्येषां विनाभवः।।2.105.27।।
हिन्दी अर्थ देखें
“किसी ऋतु का प्रारम्भ देखकर मानो वह नयी-नयी आयी हो (पहले कभी आयी ही न हो), ऐसा समझकर लोग हर्ष से खिल उठते हैं, परंतु यह नहीं जानते कि इन ऋतुओं के परिवर्तन से प्राणियों के प्राणों का (आयुका) क्रमशः क्षय हो रहा है।
Show English Translation
In a mighty ocean, two pieces of logs meet one another, float together and in due course get separated. In the same way wives, sons, relatives and riches remain together for some time and thereafter get separated. Their separation is certain.
ShlokaShloka 26
नात्र कश्चिद्यथाभावं प्राणी समभिवर्तते। तेन तस्मिन्न सामर्थ्यं प्रेतस्या स्त्यनुशोचतः।।2.105.28।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘जैसे महासागर में बहते हुए दो काठ कभी एकदूसरे से मिल जाते हैं और कुछ काल के बाद अलग भी हो जाते हैं, उसी प्रकार स्त्री, पुत्र, कुटुम्ब और धन भी मिलकर बिछुड़ जाते हैं; क्योंकि इनका वियोग अवश्यम्भावी है
Show English Translation
No living being in this world can act as he likes. Therefore, no one should grieve for the dead.
ShlokaShloka 27
यथा हि सार्थं गच्छन्तं ब्रूयात्कश्चित्पथि स्थितः। अहमप्यागमिष्यामि पृष्ठतो भवता मिति।।2.105.29।। एवं पूर्वैर्गतो मार्गः पितृपैतामहो ध्रुवः। तमापन्नः कथं शोचेद्यस्य नास्ति व्यतिक्रमः।।2.105.30।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘जैसे महासागर में बहते हुए दो काठ कभी एकदूसरे से मिल जाते हैं और कुछ काल के बाद अलग भी हो जाते हैं, उसी प्रकार स्त्री, पुत्र, कुटुम्ब और धन भी मिलकर बिछुड़ जाते हैं; क्योंकि इनका वियोग अवश्यम्भावी है
Show English Translation
Like a man standing on the wayside says to a passing caravan, 'I am following you', and follows them, the road taken by our fathers and forefathers is certain for every one and cannot be violated by a person treading that path. (So) why should a man grieve?
ShlokaShloka 28
वयसः पतमानस्य स्रोतसो वाऽनिवर्तिनः। आत्मा सुखे नियोक्तव्यस्सुखभाजः प्रजाः स्मृताः।।2.105.31।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘इस संसार में कोई भी प्राणी यथा समय प्राप्त होने वाले जन्म-मरण का उल्लङ्घन नहीं कर सकता। इसलिये जो किसी मरे हुए व्यक्ति के लिये बारंबार शोक करता है, उसमें भी यह सामर्थ्य नहीं है कि वह अपनी ही मृत्यु को टाल सके
Show English Translation
Like the flow of water which never reverts to its source, age passes. Therefore, a man must employ his self in righteous acts that bring him happiness. By doing so, it is said, people will always be happy.
ShlokaShloka 29
धर्मात्मा स शुभैः कृत्स्नैः क्रतुभिश्चाप्तदक्षिणैः। स्वर्गं दशरथः प्राप्तः पिता नः पृथिवीपतिः।।2.105.32।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘जैसे आगे जाते हुए यात्रियों अथवा व्यापारियों के समुदाय से रास्ते में खड़ा हुआ पथिक यों कहे कि मैं भी आप लोगों के पीछे-पीछे आऊँगा और तदनुसार वह उनके पीछे-पीछे जाय, उसी प्रकार हमारे पूर्वज पिता-पितामह आदि जिस मार्गसे गये हैं, जिस पर जाना अनिवार्य है तथा जिससे बचने का कोई उपाय नहीं है, उसी मार्ग पर स्थित हुआ मनुष्य किसी और के लिये शोक कैसे करे?
Show English Translation
Our righteous father and lord of the earth, Dasaratha, attained heaven by giving abundant charities and performing several sacrifices in accordance with tradition.
ShlokaShloka 30
भृत्यानां भरणात्सम्यक्प्रजानां परिपालनात्। अर्थादानाच्च धर्मेण पिता न स्त्रिदिवंगतः।।2.105.33।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘जैसे आगे जाते हुए यात्रियों अथवा व्यापारियों के समुदाय से रास्ते में खड़ा हुआ पथिक यों कहे कि मैं भी आप लोगों के पीछे-पीछे आऊँगा और तदनुसार वह उनके पीछे-पीछे जाय, उसी प्रकार हमारे पूर्वज पिता-पितामह आदि जिस मार्गसे गये हैं, जिस पर जाना अनिवार्य है तथा जिससे बचने का कोई उपाय नहीं है, उसी मार्ग पर स्थित हुआ मनुष्य किसी और के लिये शोक कैसे करे?
Show English Translation
Our father nourished his dependents, splendidly governed his subjects and accepted wealth through righteous ways. Because of these pious acts, he could go to heaven.
ShlokaShloka 31
कर्मभि स्तु शुभैरिष्टैः क्रतुभिश्चाप्तदक्षिणैः। स्वर्गं दशरथः प्राप्तः पिता नः पृथिवीपतिः।।2.105.34।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘जैसे नदियों का प्रवाह पीछे नहीं लौटता, उसी प्रकार दिन-दिन ढलती हुई अवस्था फिर नहीं लौटती है। उसका क्रमशः नाश हो रहा है, यह सोचकर आत्मा को कल्याण के साधनभूत धर्म में लगावे; क्योंकि सभी लोग अपना कल्याण चाहते हैं
Show English Translation
Dasaratha, our father and lord of the earth, reached heaven by performing auspicious acts and offering abundant charities in sacrifices.
ShlokaShloka 32
इष्ट्वा बहुविधैर्यज्ञैर्भोगां श्चावाप्य पुष्कलान्। उत्तमं चायुरासाद्य स्वर्गतः पृथिवीपतिः।।2.105.35।।
हिन्दी अर्थ देखें
वे भरण-पोषण के योग्य परिजनों का भरण करते थे। प्रजाजनों का भलीभाँति पालन करते थे और प्रजाजनों से धर्म के अनुसार कर आदि के रूप में धन लेते थे—इन सब कारणों से हमारे पिता उत्तम स्वर्गलोक में पधारे हैं।
Show English Translation
King Dasaratha, lord of the earth, having performed various kinds of sacrifices and securing a long life, enjoyed abundance of pleasures and attained heaven.
ShlokaShloka 33
आयुरुत्तममासाद्य भोगानपि च राघवः। स न शोच्यः पिता तात स्वर्गत स्सत्कृत स्सताम्।।2.105.36।।
हिन्दी अर्थ देखें
वे भरण-पोषण के योग्य परिजनों का भरण करते थे। प्रजाजनों का भलीभाँति पालन करते थे और प्रजाजनों से धर्म के अनुसार कर आदि के रूप में धन लेते थे—इन सब कारणों से हमारे पिता उत्तम स्वर्गलोक में पधारे हैं।
Show English Translation
O dear our father, king Dasaratha, who was honoured by the virtuous and enjoyed the best of pleasures attained heaven after a long life. Therefore, he is not to be grieved over.
ShlokaShloka 34
स जीर्णं मानुषं देहं परित्यज्य पिता हि नः। दैवीमृद्धिमनुप्राप्तो ब्रह्मलोकविहारिणीम्।।2.105.37।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘सर्वप्रिय शुभ कर्मों तथा प्रचुर दक्षिणवाले यज्ञों के अनुष्ठानों से हमारे पिता पृथ्वीपति महाराज दशरथ स्वर्गलोक में गये हैं
Show English Translation
Our father, king Dasaratha, abandoned the wornout mortal body, and obtained divine prosperity of wandering in the world of Brahma.
ShlokaShloka 35
तं तु नैवंविधः कश्चित्प्राज्ञ श्शोचितुमर्हति। तत्विधो मद्विधश्चापि श्रुतवान्बुद्धिमत्तरः।।2.105.38।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘तात! अन्य राजाओं की अपेक्षा उत्तम आयु और श्रेष्ठ भोगों को पाकर हमारे पिता सदा सत्पुरुषों के द्वारा सम्मानित हुए हैं; अतः स्वर्गवासी हो जाने पर भी वे शोक करने योग्य नहीं हैं
Show English Translation
No one like you or me should ever mourn about this highly sagacious and learned king who was proficient in scriptural knowledge.
ShlokaShloka 36
एते बहुविधा शोका विलापरुदिते तथा। वर्जनीया हि धीरेण सर्वावस्थासु धीमता।।2.105.39।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘तात! अन्य राजाओं की अपेक्षा उत्तम आयु और श्रेष्ठ भोगों को पाकर हमारे पिता सदा सत्पुरुषों के द्वारा सम्मानित हुए हैं; अतः स्वर्गवासी हो जाने पर भी वे शोक करने योग्य नहीं हैं
Show English Translation
A wise man, holding on to his fortitude in all circumstances, should avoid such occasions of grief, these words of lamentation and this crying.
ShlokaShloka 37
स स्वस्थो भव मा शोचेर्यात्वा चावसतां पुरीम्। तथा पित्रा नियुक्तोऽसि वशिना वदतां वर।।2.105.40।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘हमारे पिता ने जराजीर्ण मानव-शरीर का परित्याग करके दैवी सम्पत्ति प्राप्त की है, जो ब्रह्मलोक में विहार कराने वाली है।
Show English Translation
O foremost of the eloquent, compose yourself. Do not grieve. Return to the city (Ayodhya) and reside there. You have been commanded so by our father who was a man of selfcontrol.
ShlokaShloka 38
यत्राहमपि तेनैव नियुक्तः पुण्यकर्मणा। तत्रैवाहं करिष्यामि पितुरार्यस्य शासनम्।।2.105.41।।
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‘कोई भी ऐसा विद्वान्, जो तुम्हारे और मेरे समान शास्त्र-ज्ञान-सम्पन्न एवं परम बुद्धिमान् है, पिताजी के लिये शोक नहीं कर सकता
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I shall also stick to the command of our noble father who was a man of sacred deeds.
ShlokaShloka 39
न मया शासनं तस्य त्यक्तुं न्याय्य मरिन्दम। स त्वयापि सदा मान्यं स वै बन्धु स नः पिता।।2.105.42।।
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‘इसलिये तुम स्वस्थ हो जाओ, तुम्हारे मन में शोक नहीं होना चाहिये। वक्ताओं मे श्रेष्ठ भरत! तुम यहाँ से जाकर अयोध्यापुरी में निवास करो; क्योंकि मन को वश में रखने वाले पूज्य पिताजी ने तुम्हारे लिये यही आदेश दिया है
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O subduer of enemies, I cannot violate the order of the king. You also must respect it for he is our father and friend indeed.
ShlokaShloka 40
तद्वचः पितुर���वाहं सम्मतं धर्मचारिणः। कर्मणा पालयिष्यामि वनवासेन राघव।।2.105.43।।
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‘इसलिये तुम स्वस्थ हो जाओ, तुम्हारे मन में शोक नहीं होना चाहिये। वक्ताओं मे श्रेष्ठ भरत! तुम यहाँ से जाकर अयोध्यापुरी में निवास करो; क्योंकि मन को वश में रखने वाले पूज्य पिताजी ने तुम्हारे लिये यही आदेश दिया है
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O Bharata, I will, therefore, obey the command of our venerable father, the champion of righteousness, by living in the forest.
ShlokaShloka 41
धार्मिकेणानृशंसेन नरेण गुरुवर्तिना। भवितव्यं नरव्याघ्र परलोकं जिगीषता।।2.105.44।।
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उन पुण्यकर्मा महाराज ने मुझे भी जहाँ रहने की आज्ञा दी है, वहीं रहकर मैं उन पूज्य पिता के आदेश का पालन करूँगा
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O best of men, if a man aspires to conquer the higher world, he should remain virtuous, compassionate and obedient to his preceptors.
ShlokaShloka 42
आत्मानमनुतिष्ठत्वं स्वभावेन नरर्षभ। निशाम्यतु शुभं वृत्तं पितुर्दशरथस्य नः।।2.105.45।।
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‘शत्रुदमन भरत! पिताकी आज्ञा की अवहेलना करना मेरे लिये कदापि उचित नहीं है। वे तुम्हारे लिये भी सर्वदा सम्मान के योग्य हैं; क्योंकि वे ही हमलोगों के हितैषी बन्धु और जन्मदाता थे
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O best of men, having seen the auspicious life of our father Dasaratha and his conduct, you also stick to your own duty.
ShlokaShloka 43
इत्येवमुक्त्वा वचनं महात्मा पितुर्निदेश प्रतिपालनार्थम्। यवीयसं भ्रातरमर्थवच्च प्रभुर्मुहूर्ताद्विरराम रामः।।2.105.46।।
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रघुनन्दन! मैं इस वनवासरूपी कर्म के द्वारा पिताजी के ही वचन का जो धर्मात्माओं को भी मान्य है, पालन करूँगा
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Rama, the magnanimous lord, addressed his younger brother Bharata with words full of significance, saying, Obey father's command and remained silent in a moment. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे पञ्चोत्तरशततमस्सर्गः।। Thus ends the one hundredfifth sarga in Ayodhyakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.