Ayodhya Kanda
Sarga 106: Bharata pleads with Rama in several ways -- all priests, mothers etc. extol Bharata -- Rama determines to respect his father's word.
अयोध्याकाण्डम् · सर्ग 106
35 shlokas
ShlokaShloka 1
एवमुक्त्वा तु विरते रामे वचनमर्थवत्।
ततो मन्दाकिनीतीरे रामं प्रकृतिवत्सलम्।।2.106.1।।
उवाच भरत श्चित्रं धार्मिको धार्मिकं वचः।
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ऐसा अर्थयुक्त वचन कहकर जब श्रीराम चुप हो गये, तब धर्मात्मा भरत ने मन्दाकिनी के तट पर प्रजावत्सल धर्मात्मा श्रीराम से यह विचित्र बात कही —’शत्रुदमन रघुवीर! इस जगत् में जैसे आप हैं, वैसा दूसरा कौन हो सकता है ?
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Rama remained silent after saying these meaningful words on the bank of river Mandakini. Then the Bharata, conforming to righteousness, replied in clear words to the virtuous Rama who was affectionate by nature.
ShlokaShloka 2
को हि स्यादीदृशो लोके यादृश स्त्वमरिन्दमः।।2.106.2।।
न त्वां प्रव्यथयेद्दुःखं प्रीतिर्वा नप्रहर्षयेत्।
सम्मतश्चासि वृद्धानां तांश्च पृच्छसि संशयान्।।2.106.3।।
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ऐसा अर्थयुक्त वचन कहकर जब श्रीराम चुप हो गये, तब धर्मात्मा भरत ने मन्दाकिनी के तट पर प्रजावत्सल धर्मात्मा श्रीराम से यह विचित्र बात कही —’शत्रुदमन रघुवीर! इस जगत् में जैसे आप हैं, वैसा दूसरा कौन हो सकता है ?
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O subduer of enemies, you are of such nature that neither sorrow pains you nor pleasure delights you. There are none in this world like you. You are loved by the elders, for you seek their counsel whenever you have doubts.
ShlokaShloka 3
को हि स्यादीदृशो लोके यादृश स्त्वमरिन्दम।।2.106.2।।
न त्वां प्रव्यथयेद्दुःखं प्रीतिर्वा नप्रहर्षयेत्।
सम्मतश्चासि वृद्धानां तांश्च पृच्छसि संशयान्।।2.106.3।।
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‘कोई भी दुःख आपको व्यथित नहीं कर सकता। कितनी ही प्रिय बात क्यों न हो, वह आपको हर्षोत्फुल्ल नहीं कर सकती। वृद्ध पुरुषों के सम्माननीय होकर भी आप उनसे संदेह की बातें पूछते हैं
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O subduer of enemies, you are of such nature that neither sorrow pains you nor pleasure delights you. There are none in this world like you. You are loved by the elders, for you seek their counsel whenever you have doubts.
ShlokaShloka 4
यथा मृत स्तथा जीवन्यथाऽसति तथा सति।
यस्यैष बुद्धिलाभ स्स्यात्परितप्येत केन सः।।2.106.4।।
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‘जैसे मरे हुए जीवका अपने शरीर आदि से कोई सम्बन्ध नहीं रहता, उसी प्रकार जीते-जी भी वह उनके सम्बन्धसे रहित है। जैसे वस्तु के अभाव में उसके प्रति राग-द्वेष नहीं होता, वैसे ही उसके रहने पर भी मनुष्य को राग-द्वेष से शुन्य होना चाहिये। जिसे ऐसी विवेकयुक्त बुद्धि प्राप्त हो गयी है, उसको संताप क्यों होगा?
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One should accept life and death, vice and virtue equally. How can one be afflicted when he has gained such an intellect?
ShlokaShloka 5
परावरज्ञो यश्च स्याद् यथा त्वं मनुजाधिप।
स एव व्यसनं प्राप्य न विषीदितुमर्हति।।2.106.5।।
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‘नरेश्वर! जिसे आपके समान आत्मा और अनात्माका ज्ञान है, वही संकट में पड़ने पर भी विषाद नहीं कर सकता
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O lord of men, it is not proper for a person like you who knows the past and the future of human beings to feel distressed and lament over it.
ShlokaShloka 6
अमरोपमसत्त्व स्त्वं महात्मा सत्यसङ्गरः।
सर्वज्ञ स्सर्वदर्शी च बुद्धिमांश्चासि राघव।।2.106.6।।
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‘रघुनन्दन! आप देवताओं की भाँति सत्त्वगुण से सम्पन्न, महात्मा, सत्यप्रतिज्ञ, सर्वज्ञ, सबके साक्षी और बुद्धिमान् हैं
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O magnanimous Rama, your nature is divine and you are true to your promises. You are omniscient, allseeing and wise.
ShlokaShloka 7
न त्वामेवं गुणैर्युक्तं प्रभवाभवकोविदम्।
अविषह्यतमं दुःखमासादयितुमर्हति।।2.106.7।।
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‘ऐसे उत्तम गुणों से युक्त और जन्म-मरण के रहस्य को जानने वाले आपके पास असह्य दुःख नहीं आ सकता
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It is not proper for a virtuous man like you, who is cognizant in matters of life and death, to be overwhelmed by such insufferable grief.
ShlokaShloka 8
प्रोषिते मयि यत्पापं मात्रा मत्कारणात्कृतम्।
क्षुद्रया तदनिष्टं मे प्रसीदतु भवान्मम।।2.106.8।।
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‘जब मैं परदेश में था, उस समय नीच विचार रखने वाली मेरी माता ने मेरे लिये जो पाप कर डाला, वह मुझे अभीष्ट नहीं है; अतः आप उसे क्षमा करके मुझ पर प्रसन्न हों
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When I was away from home, my meanminded mother committed a sin for my sake which I never wished. You may pardon me graciously.
ShlokaShloka 9
धर्मबन्धेन बद्धोऽस्मि तेनेमां नेह मातरम्।
हन्मितीव्रेण दण्डेन दण्डार्हां पापकारिणीम्।।2.106.9।।
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‘जिनके कुल और कर्म दोनों ही शुभ थे, उन महाराज दशरथ से उत्पन्न होकर धर्म और अधर्म को जानता हुआ भी मैं मातृवधरूपी लोकनिन्दित कर्म कैसे करूँ?
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I am bound by a bond of righteousness for which I am unble to slay my mother who deserves severe punishment for her sinful acts.
ShlokaShloka 10
कथं दशरथा ज्जात श्शुद्धाभिजनकर्मणः।
जानन् धर्ममधर्मिष्ठं कुर्यां कर्म जुगुप्सितम्।।2.106.10।।
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‘जिनके कुल और कर्म दोनों ही शुभ थे, उन महाराज दशरथ से उत्पन्न होकर धर्म और अधर्म को जानता हुआ भी मैं मातृवधरूपी लोकनिन्दित कर्म कैसे करूँ?
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How shall I, born to Dasaratha of noble race and righteous deeds, with the knowledge of dharma, do such a reprehensible and unrighteous deed?
ShlokaShloka 11
गुरुः क्रियावान्वृद्धश्च राजा प्रेतः पितेतिच।
तातं न परिगर्हेयं दैवतं चेति संसदि।।2.106.11।।
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‘महाराज मेरे गुरु, श्रेष्ठ यज्ञकर्म करने वाले, बड़ेबूढ़े, राजा, पिता और देवता रहे हैं और इस समय परलोकवासी हो चुके हैं, इसीलिये इस भरी सभा में मैं उनकी निन्दा नहीं करता हूँ
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King Dasaratha, my father and preceptor, is godlike to me. Devoted to meritorious acts, he departed from this world in his old age. For this reason, I cannot reproach him (publicly) in this assembly (of men).
ShlokaShloka 12
को हि धर्मार्थयोर्हीनमीदृशं कर्म किल्बिषम्।
स्त्रियाः प्रियं चिकीर्षु स्सन्कुर्याद्धर्मज्ञ धर्मवित्।।2.106.12।।
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‘धर्मज्ञ रघुनन्दन! कौन ऐसा मनुष्य है, जो धर्म को जानते हुए भी स्त्री का प्रिय करने की इच्छा से ऐसा धर्मऔर अर्थ से हीन कुत्सित कर्म कर सकता है ?
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O Rama, conversant with righteousness, will any one who knows the meaning of righteousness, do such a sinful act contrary to dharma and artha to please a woman?
ShlokaShloka 13
अन्तकाले हि भूतानि मुह्यन्तीति पुरा श्रुतिः।
राज्ञैवं कुर्वता लोके प्रत्यक्षं सा श्रुतिः कृता।।2.106.13।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘लोक में एक प्राचीन किंवदन्ती है कि अन्तकाल में सब प्राणी मोहित हो जाते हैं उनकी बुद्धि नष्ट हो जाती है। राजा दशरथ ने ऐसा कठोर कर्म करके उस किंवदन्ती की सत्यता को प्रत्यक्ष कर दिखाया
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There is an ancient saying that at the time of death, the intellect of people is deluded. By conducting himself in this way, king Dasaratha has proved it.
ShlokaShloka 14
साध्वर्थमभिसन्धाय क्रोधान्मोहाच्च साहसात्।
तातस्य यदतिक्रान्तं प्��त्याहरतु तद्भवान्।।2.106.14।।
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‘पिताजी ने क्रोध, मोह और साहस के कारण ठीक समझ कर जो धर्म का उल्लङ्घन किया है, उसे आप पलट दें—उसका संशोधन कर दें
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Our father has trangressed righteousness due to anger or delusion or recklessness. Therefore, you may think over the matter prudently and set it right.
ShlokaShloka 15
पितुर्हि समतिक्रान्तं पुत्रो यस्साधु मन्यते।
तदपत्यं मतं लोके विपरीतमतोऽन्यथा।।2.106.15।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘जो पुत्र पिताकी की हुई भूल को ठीक कर देता है, वही लोक में उत्तम संतान माना गया है। जो इसके विपरीत बर्ताव करता है, वह पिताकी श्रेष्ठ संतति नहीं है
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One who sets right the wrongs done by his father is a true son. Otherwise the son becomes just the opposite. (He is not a son to the father).
ShlokaShloka 16
तदपत्यं भवानस्तु मा भवान् दुष्कृतं पितुः।
अभिपत्ता कृतं कर्म लोके धीरविगर्हितम्।।2.106.16।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘कैकेयी, मैं, पिताजी, सुहृद्गुण, बन्धु-बान्धव, पुरवासी तथा राष्ट्र की प्रजा-इन सबकी रक्षा के लिये आप मेरी प्रार्थना स्वीकार करें
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So be a worthy son and let not the sinful act committed by our father and condemned by men of wisdom be approved by you.
ShlokaShloka 17
कैकेयीं मां च तातं च सुहृदो बान्धवांश्च नः।
पौरजानपदान्सर्वांस्त्रातु सर्वमिदं भवान्।।2.106.17।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘कैकेयी, मैं, पिताजी, सुहृद्गुण, बन्धु-बान्धव, पुरवासी तथा राष्ट्र की प्रजा-इन सबकी रक्षा के लिये आप मेरी प्रार्थना स्वीकार करें
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Protect this entire kingdom, Kaikeyi, me and father, our friends and relations, citizens of the city and inhabitants of the countryside.
ShlokaShloka 18
क्व चारण्यं क्वच क्षात्रं क्व जटाः क्व च पालनम्।
ईदृशं व्याहतं कर्म न भवान्कर्तुमर्हति।।2.106.18।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘कहाँ वनवास और कहाँ क्षात्रधर्म? कहाँ जटाधारण और कहाँ प्रजा का पालन? ऐसे परस्परविरोधी कर्म आपको नहीं करने चाहिये
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Where is the forest and where is kshatriya's duty? Where are matted locks and where is governance of the kingdom? It does not behave you to do such acts antithetical to each other.
ShlokaShloka 19
एष हि प्रथमो धर्मः क्षत्रियस्याभिषेचनम्।
येन शक्यं महाप्राज्ञ प्रजानां परिपालनम्।।2.106.19।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘महाप्राज्ञ! क्षत्रिय के लिये पहला धर्म यही है कि उसका राज्यपर अभिषेक हो, जिससे वह प्रजा का भलीभाँति पालन कर सके
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O sagacious one, the primary duty of a kshatriya is to be crowned. This enables him to rule his subjects.
ShlokaShloka 20
कश्च प्रत्यक्षमुत्सृज्य संशयस्थ मलक्षणम्।
आयतिस्थं चरे द्धर्मं क्षत्रबन्दुरनिश्चितम्।।2.106.20।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘भला कौन ऐसा क्षत्रिय होगा, जो प्रत्यक्ष सुख के साधनभूत प्रजापालन रूप धर्म का परित्याग करके संशय में स्थित, सुखके लक्षणसे रहित, भविष्य में फल देने वाले अनिश्चित धर्मका आचरण करेगा?
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Will any kshatriya, setting aside his first duty, follow an uncertain course of piety which is contrary to his dharma and whose impact may be felt in a remote future.
ShlokaShloka 21
अथ क्लेशज मेव त्वं धर्मं चरितु मिच्छसि।
धर्मेण चतुरो वर्णान्पालयन् क्लेश माप्नुहि।।2.106.21।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘यदि आप क्लेशसाध्य धर्म का ही आचरण करना चाहते हैं तो धर्मानुसार चारों वर्गों का पालन करते हुए ही कष्ट उठाइये
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If you so desire to follow the path of dharma acquired out of physical exertion, then bear the trouble of governing the four castes of the social order righteously.
ShlokaShloka 22
चतुर्णामाश्रमाणां हि गार्हस्थ्यं श्रेष्ठमुत्तमम्।
आहुर्धर्मज्ञ धर्मज्ञास्तं कथं त्यक्तु मर्हसि।।2.106.22।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
“धर्मज्ञ रघुनन्दन! धर्म के ज्ञाता पुरुष चारों आश्रमों में गार्हस्थ्य को ही श्रेष्ठ बतलाते हैं, फिर आप उसका परित्याग क्यों करना चाहते हैं?
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O Rama, you are the one who knows his duty. The knowers of dharma maintain that the life of a householder is the foremost among the four modes of life. How can you renounce it?
ShlokaShloka 23
श्रुतेन बालः स्थानेन जन्मना भवतो ह्यहम्।
स कथं पालयिष्यामि भूमिं भवति तिष्ठति।।2.106.23।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘मैं बुद्धि और गुण दोनों से हीन हूँ, बालक हूँ तथा मेरा स्थान आपसे बहुत छोटा है; अतः मैं आपके बिना जीवन-धारण भी नहीं कर सकता, राज्य का पालन तो दूरकी बात है
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Being younger to you in knowledge, position and birth, how can I rule the earth when you are present?
ShlokaShloka 24
हीनबुद्धिगुणो बालो हीनः स्थानेन चाप्यहम्।
भवता च विनाभूतो न वर्तयितुमुत्सुहे।।2.106.24।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘मैं बुद्धि और गुण दोनों से हीन हूँ, बालक हूँ तथा मेरा स्थान आपसे बहुत छोटा है; अतः मैं आपके बिना जीवन-धारण भी नहीं कर सकता, राज्य का पालन तो दूरकी बात है
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I am a child, deficient in intelligence and virtue and even inferior in position. Deserted by you, I do not wish to live.
ShlokaShloka 25
इदं निखिल मव्यग्रं राज्यं पित्र्यमकण्टकम्।
अनुशाधि स्वधर्मेण धर्मज्ञ सहबान्धवैः।।2.106.25।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘धर्मज्ञ रघुनन्दन! पिताका यह सारा राज्य श्रेष्ठ और निष्कण्टक है, अतः आप बन्धु-बान्धवों के साथ स्वधर्मानुसार इसका पालन कीजिये
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O one, conversant with righteousness rule unhindered this entire kingdom along with our relations inherited from our father.
ShlokaShloka 26
इहैव त्वाऽभिषिञ्चन्तु सर्वाः प्रकृतय स्सह।
ऋत्विज स्सवसिष्ठाश्च मन्त्रविन्मन्त्रकोविदाः।।2.106.26।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘मन्त्रज्ञ रघुवीर! मन्त्रों के ज्ञाता महर्षि वसिष्ठ आदि सभी ऋत्विज् तथा मन्त्री, सेनापति और प्रजा आदि सारी प्रकृतियाँ यहाँ उपस्थित हैं। ये सब लोग यहीं आपका राज्याभिषेक करें
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Let all ministers, subjects, and priests including Vasistha who are wellversed in Vedic hymns consecrate you here itself.
ShlokaShloka 27
अभिषिक्तस्त्वमस्माभिरयोध्यां पालने व्रज।
विजित्य तरसा लोकान्मरुद्भिरिव वासवः।।2.106.27।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘वहाँ देवता, ऋषि और पितरों का ऋण चुकायें, दुष्ट शत्रुओं का भलीभाँति दमन करें तथा मित्रों को उनके इच्छानुसार वस्तुओं द्वारा तृप्त करते हुए आप ही अयोध्या वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, "अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या"और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन (लगभग १४४ कि.मी) लम्बाई अाैर तीन योजन (लगभग ३६ कि.मी.) चौड़ाई में बसी थी । कई शताब्दी तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। " href="https://www.ramcharit.in/glossary/%e0%a4%85%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/" data-gt-translate-attributes='[{"attribute":"data-cmtooltip", "format":"html"}]' tabindex='0' role='link'>अयोध्या में मुझे धर्म की शिक्षा देते रहें
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After consecration, you too return to rule Ayodhya along with all of us like Indra who went back (to heaven), accompanied by Maruts after conquering all the worlds with his prowess.
ShlokaShloka 28
ऋणानि त्रीण्यपाकुर्वन्दुर्हृदस्साधु निर्दहन्।
सुहृदस्तर्पयन्कामैस्त्वमेवात्रानुशाधि माम्।।2.106.28।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘वहाँ देवता, ऋषि और पितरों का ऋण चुकायें, दुष्ट शत्रुओं का भलीभाँति दमन करें तथा मित्रों को उनके इच्छानुसार वस्तुओं द्वारा तृप्त करते हुए आप ही अयोध्या वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, "अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या"और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन (लगभग १४४ कि.मी) लम्बाई अाैर तीन योजन (लगभग ३६ कि.मी.) चौड़ाई में बसी थी । कई शताब्दी तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। " href="https://www.ramcharit.in/glossary/%e0%a4%85%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/" data-gt-translate-attributes='[{"attribute":"data-cmtooltip", "format":"html"}]' tabindex='0' role='link'>अयोध्या में मुझे धर्म की शिक्षा देते रहें
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Discharging completely the three debts, to gods, to ancestors and to sages, subduing your enemies and gratifying your friends, you alone (have the right) to dictate me.
ShlokaShloka 29
अद्याऽर्य मुदिता स्सन्तु सुहृदस्तेऽभिषेचने।
अद्य भीताः पलायन्तां दुर्हृदस्ते दिशो दश।।2.106.29।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘आर्य! आपका अभिषेक सम्पन्न होने पर सुहृद्गण प्रसन्न हों और दुःख देने वाले आपके शत्रु भयभीत होकर दसों दिशाओं में भाग जायें
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O my esteemed brother let all your friends be delighted today at your enthronement and your enemies flee in terror in ten different directions.
ShlokaShloka 30
आक्रोशं मम मातुश्च प्रमृज्य पुरुषर्षभ।
अद्य तत्र भवन्तं च पितरं रक्ष किल्बिषात्।।2.106.30।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘मैं आपके चरणों में माथा टेककर याचना करता हूँ। आप मुझपर दया कीजिये। जैसे महादेवजी सब प्राणियों पर अनुग्रह करते हैं, उसी प्रकार आप भी अपने बन्धु-बान्धवों पर कृपा कीजिये
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O best of men, wiping out all the censure on my mother, redeem our revered father from sin.
ShlokaShloka 31
शिरसा त्वाऽभियाचेऽहं कुरुष्व करुणां मयि।
बान्धवेषु च सर्वेषु भूतेष्विव महेश्वरः।।2.106.31।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘मैं आपके चरणों में माथा टेककर याचना करता हूँ। आप मुझपर दया कीजिये। जैसे महादेवजी सब प्राणियों पर अनुग्रह करते हैं, उसी प्रकार आप भी अपने बन्धु-बान्धवों पर कृपा कीजिये
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I beseech you with my head bowed low, show mercy on me and every one of our relations, like Maheswara showing compassion on all living beings.
ShlokaShloka 32
अथैतत्पृष्ठतः कृत्वा वनमेव भवानितः।
गमिष्यति गमिष्यामि भवता सार्धमप्यहम्।।2.106.32।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
ग्लानि में पड़े हुए भरत ने मनोभिराम राजा श्रीराम को उनके चरणों में माथा टेककर प्रसन्न करने की चेष्टा की तथापि उन सत्त्वगुणसम्पन्न रघुनाथजी ने पिताकी आज्ञा में ही दृढ़तापूर्वक स्थित रहकर अयोध्या वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, "अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या"और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन (लगभग १४४ कि.मी) लम्बाई अाैर तीन योजन (लगभग ३६ कि.मी.) चौड़ाई में बसी थी । कई शताब्दी तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। " href="https://www.ramcharit.in/glossary/%e0%a4%85%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/" data-gt-translate-attributes='[{"attribute":"data-cmtooltip", "format":"html"}]' tabindex='0' role='link'>अयोध्या जाने का विचार नहीं किया
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If you turn your back on my solicitations and set out for the forest I shall also go along with you from here itself.
ShlokaShloka 33
तथाहि रामो भरतेन ताम्यता प्रसाद्यमानश्शिरसा महीपतिः।
नचैव चक्रे गमनाय सत्त्ववान्मतिं पितुस्तद्वचने प्रतिष्ठितः।।2.106.33।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
ग्लानि में पड़े हुए भरत ने मनोभिराम राजा श्रीराम को उनके चरणों में माथा टेककर प्रसन्न करने की चेष्टा की तथापि उन सत्त्वगुणसम्पन्न रघुनाथजी ने पिताकी आज्ञा में ही दृढ़तापूर्वक स्थित रहकर अयोध्या वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, "अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या"और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन (लगभग १४४ कि.मी) लम्बाई अाैर तीन योजन (लगभग ३६ कि.मी.) चौड़ाई में बसी थी । कई शताब्दी तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। " href="https://www.ramcharit.in/glossary/%e0%a4%85%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/" data-gt-translate-attributes='[{"attribute":"data-cmtooltip", "format":"html"}]' tabindex='0' role='link'>अयोध्या जाने का विचार नहीं किया
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Thus besought and propitiated by Bharata with his head bowed low and distressed, the virtuous lord of the world, Rama, firmly established in the words of his father, resolved not to go back to Ayodhya.
ShlokaShloka 34
तदद्भुतं स्थैर्यमवेक्ष्य राघवे समं जनो हर्षमवाप दुःखितः।
न यात्ययोध्यामिति दुःखितोऽभवत् स्थिरप्रतिज्ञत्वमवेक्ष्य हर्षितः।।2.106.34।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
उस समय ऋत्विज् पुरवासी, भिन्न-भिन्न समुदाय के नेता और माताएँ अचेत-सी होकर आँस बहाती हुई पूर्वोक्त बातें कहने वाली भरत की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगी और सबने उनके साथ ही योग्यतानुसार श्रीरामजी के सामने विनीत होकर उनसे अयोध्या वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, "अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या"और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन (लगभग १४४ कि.मी) लम्बाई अाैर तीन योजन (लगभग ३६ कि.मी.) चौड़ाई में बसी थी । कई शताब्दी तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। " href="https://www.ramcharit.in/glossary/%e0%a4%85%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/" data-gt-translate-attributes='[{"attribute":"data-cmtooltip", "format":"html"}]' tabindex='0' role='link'>अयोध्या लौट चलने की याचना की
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Having seen the wonderful deternmination of Rama, people were, at once, anguished and delighted, anguished because he would not return to Ayodhya, and delighted because he was firm in his resolve.
ShlokaShloka 35
तमृत्विजो नैगमयूथवल्लभास्तदा विसंज्ञाश्रुकलाश्च मातरः।
तथा ब्रुवाणं भरतं प्रतुष्टुवुः प्रणम्य रामं च ययाचिरे सह।।2.106.35।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
उस समय ऋत्विज् पुरवासी, भिन्न-भिन्न समुदाय के नेता और माताएँ अचेत-सी होकर आँस बहाती हुई पूर्वोक्त बातें कहने वाली भरत की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगी और सबने उनके साथ ही योग्यतानुसार श्रीरामजी के सामने विनीत होकर उनसे अयोध्या वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, "अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या"और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन (लगभग १४४ कि.मी) लम्बाई अाैर तीन योजन (लगभग ३६ कि.मी.) चौड़ाई में बसी थी । कई शताब्दी तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। " href="https://www.ramcharit.in/glossary/%e0%a4%85%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/" data-gt-translate-attributes='[{"attribute":"data-cmtooltip", "format":"html"}]' tabindex='0' role='link'>अयोध्या लौट चलने की याचना की
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All the priests, the chiefs of merchant organizations and mothers who had their senses switched off and theif tears drained dry extolled Bharata for his words. All of them, reverentially saluting Rama, implored him. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे षडुत्तरशततमस्सर्गः।। Thus ends the one hundredsixth sarga in Ayodhyakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.