Ayodhya Kanda

Sarga 119: Rama, Lakshmana and Sita take leave of Atri and Anasuya -- enter the Dandaka forest.

अयोध्याकाण्डम् · सर्ग 119

21 shlokas

ShlokaShloka 1
अनसूया तु धर्मज्ञा श्रुत्वा तां महतीं कथाम्। पर्यष्वजत बाहुभ्यां शिरस्याघ्राय मैथिलीम्।।2.119.1।।
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‘बेटी! तुमने सुस्पष्ट अक्षर वाले शब्दों में यह विचित्र एवं मधुर प्रसङ्ग सुनाया। तुम्हारा स्वयंवर जिस प्रकार हुआ था, वह सब मैंने सुन लिया
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Then righteous Anasuya, having heard the great story of Sita, kissed her on the forehead and embraced her with both the arms.
ShlokaShloka 2
व्यक्ताक्षरपदं चित्रं भाषितं मधुरं त्वया। यथा स्वयंवरं वृत्तं तत्सर्वं हि श्रुतं मया।।2.119.2।। रमेऽहं कथया ते तु दृढं मधुरभाषिणि।
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‘बेटी! तुमने सुस्पष्ट अक्षर वाले शब्दों में यह विचित्र एवं मधुर प्रसङ्ग सुनाया। तुम्हारा स्वयंवर जिस प्रकार हुआ था, वह सब मैंने सुन लिया
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You have related wonderfully and sweetly your Swayamvara with each word and each syllable uttered clearly. I have heard everything as it happened. O sweetspeaking Sita, I have greatly enjoyed your story.
ShlokaShloka 3
रविरस्तङ्गतश्श्रीमानुपोह्य रजनीं शिवाम्।।2.119.3।। दिवसं प्रतिकीर्णानामाहारार्थं पतत्रिणाम्। सन्ध्याकाले निलीनानां निद्रार्थं श्रूयते ध्वनिः।।2.119.4।।
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‘ये जल से भीगे हुए वल्कल धारण करने वाले मुनि, जिनके शरीर स्नान के कारण आर्द्र दिखायी देते हैं, जलसे भरे कलश उठाये एक साथ आश्रम की ओर लौट रहे हैं।
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The resplendent Sun has set. The auspcious night is drawing near. The birds who forage far and wide for food during the day return to their nests to rest for the night. You can hear them twittering.
ShlokaShloka 4
एते चाप्यभिषेकार्द्रा मुनयः कलशोद्यताः। सहिता उपवर्तन्ते सलिलाप्लुतवल्कलाः।।2.119.5।।
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‘ये जल से भीगे हुए वल्कल धारण करने वाले मुनि, जिनके शरीर स्नान के कारण आर्द्र दिखायी देते हैं, जलसे भरे कलश उठाये एक साथ आश्रम की ओर लौट रहे हैं।
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The sages also are returning in groups with waterpitchers filled with water and their bark robes soaked with water after their ceremonial bath.
ShlokaShloka 5
ऋषीणामग्निहोत्रेषु हुतेषु विधिपूर्वकम्। कपोताङ्गारुणो धूमो दृश्यते पवनोद्धतः।।2.119.6।।
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‘ये जल से भीगे हुए वल्कल धारण करने वाले मुनि, जिनके शरीर स्नान के कारण आर्द्र दिखायी देते हैं, जलसे भरे कलश उठाये एक साथ आश्रम की ओर लौट रहे हैं।
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The ascetics have duly offered oblations to the fire in Agnihotra sacrifices and the smoke, tawny like the pigeon's body, emanates wafted by the wind.
ShlokaShloka 6
अल्पपर्णा हि तरवो घनीभूतास्समन्ततः। विप्रकृष्टेन्द्रिये देशेऽस्मिन्न प्रकाशन्ति वै दिशः।।2.119.7।।
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‘महर्षि (अत्रि) ने विधिपूर्वक अग्निहोत्र-सम्बन्धी होमकर्म सम्पन्न कर लिया है, अतः वायु के वेग से ऊपर को उठा हुआ यह कबूतर के कण्ठ की भाँति श्यामवर्ण का धूम दिखायी दे रहा है
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The trees with sparse leaves all over have grown dense, the quarters in the distant region are no longer discernible by the senses.
ShlokaShloka 7
रजनीचरसत्त्वानि प्रचरन्ति समन्ततः। तपोवनमृगा ह्येते वेदितीर्थेषु शेरते।।2.119.8।।
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‘अपनी इन्द्रियों से दूर देश में चारों ओर जो वृक्ष दिखायी देते हैं, वे थोड़े पत्तेवाले होने पर भी अन्धकार से व्याप्त हो घनीभूत हो गये हैं; अतएव दिशाओं का भान नहीं हो रहा है
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The night rangers have started moving everywhere and the deer in the penance grove are beginning to sleep around the sacred altars.
ShlokaShloka 8
सम्प्रवृत्तानिशा सीते नक्��त्रसमलङ्कृता। ज्योत्स्नाप्रावरणश्चन्द्रो दृश्यतेऽभ्युदितोऽम्बरे।।2.119.9।।
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‘रात को विचरने वाले प्राणी (उल्लू आदि) सब ओर विचरण कर रहे हैं तथा ये तपोवन के मृग पुण्यक्षेत्र स्वरूप आश्रम के वेदी आदि विभिन्न प्रदेशों में सो रहे हैं।
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O Sita, adorned with stars, the night has commenced. You can see the moon rising in the sky spreading his mantle of light.
ShlokaShloka 9
गम्यतामनुजानामि रामस्यानुचरी भव। कथायन्त्या हि मधुरं त्वयाऽहं परितोषिता।।2.119.10।।
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‘अतः अब जाओ, मैं तुम्हें जाने की आज्ञा देती हूँ। जाकर श्रीरामचन्द्रजी की सेवा में लग जाओ। तुमने अपनी मीठी-मीठी बातों से मुझे भी बहुत संतुष्ट किया है
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With my permission you may go now and be a companion of Rama. I am thoroughly contented with your story told so sweetly.
ShlokaShloka 10
अलङ्कुरु च तावत्त्वं प्रत्यक्षं मम मैथिलि। प्रीतिं जनय मे वत्से दिव्यालङ्कारशोभिता।।2.119.11।।
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‘अतः अब जाओ, मैं तुम्हें जाने की आज्ञा देती हूँ। जाकर श्रीरामचन्द्रजी की सेवा में लग जाओ। तुमने अपनी मीठी-मीठी बातों से मुझे भी बहुत संतुष्ट किया है
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O Sita, adorn yourself in my presence. Dear child, permit me the pleasure of adorning you with these divine ornaments.
ShlokaShloka 11
सा तथा समलङ्कृत्य सीता सुरसुतोपमा। प्रणम्य शिरसा तस्यै रामं त्वभिमुखी ययौ।।2.119.12।।
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यह सुनकर देवकन्या के समान सुन्दरी सीता ने उस समय उन वस्त्राभूषणों से अपना शृङ्गार किया और अनसूया के चरणों में सिर झुकाकर प्रणाम करने के अनन्तर वे श्रीराम के सम्मुख गयीं
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Sita, adorned, looked like the daughter of a god. She bowed at the feet of Anasuya in reverence and set out to meet Rama.
ShlokaShloka 12
तथा तु भूषितां सीतां ददर्श वदतां वरः। राघवः प्रीतिदानेन तपस्विन्या जहर्ष च।।2.119.13।।
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यह सुनकर देवकन्या के समान सुन्दरी सीता ने उस समय उन वस्त्राभूषणों से अपना शृङ्गार किया और अनसूया के चरणों में सिर झुकाकर प्रणाम करने के अनन्तर वे श्रीराम के सम्मुख गयीं
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Rama, the most eloquent among men, saw Sita adorned, and rejoiced at the gifts of love given by the ascetic Anasuya.
ShlokaShloka 13
न्यवेदयत्ततस्सर्वं सीता रामाय मैथिली। प्रीतिदानं तपस्विन्या वसनाभरणस्रजम्।।2.119.14।।
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श्रीराम ने जब इस प्रकार सीता को वस्त्र और आभूषणों से विभूषित देखा, तब तपस्विनी अनसूया के उस प्रेमोपहार के दर्शन से वक्ताओं में श्रेष्ठ श्रीरघुनाथजी को बड़ी प्रसन्नता हुई
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Sita the princess of Mithila related everything to Rama and showed him the gifts of love given by ascetic Anasuya -- raiment, jewellery and garlands.
ShlokaShloka 14
प्रहृष्टस्त्वभवद्रामो लक्ष्मणश्च महारथः। मैथिल्यास्सत्क्रियां दृष्ट्वा मानुषेषु सुदुर्लभाम्।।2.119.15।।
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उस समय मिथिलेशकुमारी सीता ने तपस्विनी अनसूया के हाथ से जिस प्रकार वस्त्र, आभूषण और हार आदि का प्रेमोपहार प्राप्त हुआ था, वह सब श्रीरामचन्द्रजी से कह सुनाया।
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Rama the great charioteer and Lakshmana were exceedingly gratified to see the honour conferred on Sita, rare among mortals.
ShlokaShloka 15
ततस्तां शर्वरीं प्रीतः पुण्यां शशिनिभाननः। अर्चितस्तापसै स्स���द्धैरुवास रघुनन्दनः।।2.119.16।।
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तदनन्तर समस्त तपस्विजनों से सम्मानित हुए रघुकुलनन्दन श्रीराम ने अनसूया के दिये हुए पवित्र अलंकार आदि से अलंकृत चन्द्रमुखी सीता को देखकर बड़ी प्रसन्नता के साथ वहाँ रात्रिभर निवास किया
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Thereafter, the descendant of Raghu, whose countenance resembled the Moon, having received the hospitality of the accomplished ascetics, passed that holy night in delight.
ShlokaShloka 16
तस्यां रात्र्यां व्यतीतायामभिषिच्य हुताग्निकान्। आपृच्छेतां नरव्याघ्रौ तापसान्वनगोचरान्।।2.119.17।।
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तदनन्तर समस्त तपस्विजनों से सम्मानित हुए रघुकुलनन्दन श्रीराम ने अनसूया के दिये हुए पवित्र अलंकार आदि से अलंकृत चन्द्रमुखी सीता को देखकर बड़ी प्रसन्नता के साथ वहाँ रात्रिभर निवास किया
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Night over, the two best men, Rama and Lakshmana, after their ablution took leave of the ascetics inhabiting the forest who offered morning oblations to the fire .
ShlokaShloka 17
तावूचुस्ते वनचरास्तापसा धर्मचारिणः। वनस्य तस्य सञ्चारं राक्षसैस्समभिप्लुतम्।।2.119.18।।
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वह रात बीतने पर जब सभी वनवासी तपस्वी मुनि स्नान करके अग्निहोत्र कर चुके, तब पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण ने उनसे जाने के लिये आज्ञा माँगी
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The righteous ascetics dwelling in the forest informed both Rama and Lakshmana that part of the forest infested by demons.
ShlokaShloka 18
रक्षांसि पुरुषादानि नानारूपाणि राघव। वसन्त्यस्मिन्महारण्ये व्यालाश्च रुधिराशनाः।।2.119.19।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘रघुकुलभूषण! यही वह मार्ग है, जिससे महर्षि लोग वन के भीतर फल-मूल लेने के लिये जाते हैं। आपको भी इसी मार्ग से इस दुर्गम वन में प्रवेश करना चाहिये’
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O Rama, this great forest is haunted by carnivorous demons who can assume any form and by blooddrinking wild animals.
ShlokaShloka 19
उच्छिष्टं वा प्रमत्तं वा तापसं धर्मचारिणम्। अदन्त्यस्मिन्महारण्ये तान्निवारय राघव।।2.119.20।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘रघुकुलभूषण! यही वह मार्ग है, जिससे महर्षि लोग वन के भीतर फल-मूल लेने के लिये जाते हैं। आपको भी इसी मार्ग से इस दुर्गम वन में प्रवेश करना चाहिये’
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O Rama, in this great forest demons will devour the ascetics if they find them impure or intoxicated or indolent. Prevent them.
ShlokaShloka 20
एष पन्था महर्षीणां फलान्याहरतां वने। अनेन तु वनं दुर्गं गन्तुं राघव ते क्षमम्।।2.119.21।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘रघुकुलभूषण! यही वह मार्ग है, जिससे महर्षि लोग वन के भीतर फल-मूल लेने के लिये जाते हैं। आपको भी इसी मार्ग से इस दुर्गम वन में प्रवेश करना चाहिये’
Show English Translation
O Rama, this is the one path in the forest used by the ascetics to gather fruits. You can safely cross the otherwise impassable forest through this path.
ShlokaShloka 21
इतीव तैः प्राञ्जलिभिस्तपस्विभिर्द्विजैः कृतस्वस्त्ययनः परन्तपः। वनं सभार्यः प्रविवेश राघवस्सलक्ष्मणस्सूर्य इवाभ्रमण्डलम्।।2.119.22।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘रघुकुलभूषण! यही वह मार्ग है, जिससे महर्षि लोग वन के भीतर फल-मूल लेने के लिये जाते हैं। आपको भी इसी मार्ग से इस दुर्गम वन में प्रवेश करना चाहिये’
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The ascetics offered their blessings to Rama the tormentor of enemies. Thereafter, accompanied by his wife and Lakshmana, he entered the great forest like the Sun entering the mass of clouds. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे श्रीमद्वाल्मीकीय आदिकाव्ये चतुर्विंशत्सहस्रिकायां संहितयां श्रीमदयोध्याकाण्डे एकोनविंशत्युत्तरशततमस्सर्गः।। Thus ends the hundrednineteenth sarga in Ayodhyakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.