Ayodhya Kanda
Sarga 23: Lakshmana speaks of his valour-- condemns destiny as feeble and powerless-- urges Rama to get consecrated-- Rama resolves to obey his father's command.
अयोध्याकाण्डम् · सर्ग 23
37 shlokas
ShlokaShloka 1
इति ब्रुवति रामे तु लक्ष्मणोऽधश्शिरा मुहुः।
श्रृत्वा मध्यं जगामेव मनसा दुःखहर्षयोः।।2.23.1।।
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श्रीरामचन्द्रजी जब इस प्रकार कह रहे थे, उस समय लक्ष्मण सिर झुकाये कुछ सोचते रहे; फिर सहसा शीघ्रतापूर्वक वे दुःख और हर्ष के बीच की स्थिति में आ गये (श्रीराम के राज्याभिषेक में विघ्न पड़ने के कारण उन्हें दुःख हुआ और उनकी धर्म में दृढ़ता देखकर प्रसन्नता हुई)
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While Rama was speaking thus, Lakshmana listened to him with his head down, experiencing both grief and joy.
ShlokaShloka 2
तदा तु बध्द्वा भ्रुकुटीं भ्रुवोर्मध्ये नरर्षभः।
निशश्वास महासर्पो बिलस्थ इव रोषितः।।2.23.2।।
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नरश्रेष्ठ लक्ष्मण ने उस समय ललाट में भौंहों को चढ़ाकर लंबी साँस खींचना आरम्भ किया, मानो बिल में बैठा हुआ महान् सर्प रोष में भरकर फुकार मार रहा हो
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Lakshmana, frowning between his eyebrows, hissed like a great serpent seized with anger in its hole.
ShlokaShloka 3
तस्य दुष्प्रतिवीक्षं तद्भ्रुकुटीसहितं तदा।
बभौ क्रुद्धस्य सिंहस्य मुखस्य सदृशं मुखम्।।2.23.3।।
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तनी हुई भौंहों के साथ उस समय उनका मुख कुपित हुए सिंह के मुख के समान जान पड़ता था, उसकी ओर देखना कठिन हो रहा था
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With his frown, his face looked frightening like the face of a lion provoked.
ShlokaShloka 4
अग्रहस्तं विधुन्वंस्तु हस्ती हस्तमिवात्मनः।
तिर्यगूर्ध्वं शरीरे च पातयित्वा शिरोधराम्।।2.23.4।।
अग्राक्ष्णा वीक्षमाणस्तु तिर्यग्भ्रातरमब्रवीत्।
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जैसे हाथी अपनी सूंड हिलाया करता है, उसी प्रकार वे अपने दाहिने हाथ को हिलाते और गर्दन को शरीर में ऊपर-नीचे और अगल-बगल सब ओर घुमाते हुए नेत्रों के अग्रभाग से टेढ़ी नजरों द्वारा अपने भाई श्रीराम को देखकर उनसे बोले-॥४ १/२॥
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Shaking his forearm like an elephant raising its trunk, moving his neck horizontally and vertically and casting a pointed and oblique look at his brother, Lakshmana said:
ShlokaShloka 5
अस्थाने सम्भ्रमो यस्य जातो वै सुमहानयम्।।2.23.5।।
धर्मदोष प्रसङ्गेन लोकस्यानतिशङ्कया।
कथंह्येतदसम्भ्रान्तस्त्वद्विधो वक्तुमर्हति।।2.23.6।।
यथा दैवमशौडीरं शौण्डीर क्षत्रियर्षभ।
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O Rama, the greatest among the brave kshatriyas you say this because of your fear that (by disobeying father's command) harm will be done to righteousness. This great haste is unwarranted for there is the least apprehension about people's verdict (in favour of exile). How do you, of all persons, speak about destiny as allpowerful in these circumstances when it is powerless?
ShlokaShloka 6
किन्नाम कृपणं दैवमशक्तमभिशंससि।।2.23.7।।
पापयोस्ते कथं नाम तयोश्शङ्का न विद्यते।
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Why do you extol this pitiable and powerless destiny? Why don't you doubt those two vicious persons (Dasaratha and Kaikeyi)?
ShlokaShloka 7
सन्ति धर्मोपधा श्लक्ष्णाः धर्मात्मन्किं न बुध्यसे।।2.23.8।।
तयोस्सुचरितं स्वार्थं शाठ्यात्परिजिहीर्षतोः।
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भैया! आप समझते हैं कि यदि पिता की इस आज्ञा का पालन करने के लिये मैं वन को न जाऊँ तो धर्म के विरोध का प्रसङ्ग उपस्थित होता है, इसके सिवा लोगों के मन में यह बड़ी भारी शङ्का उठ खड़ी होगी कि जो पिता की आज्ञा का उल्लङ्घन करता है, वह यदि राजा ही हो जाय तो हमारा धर्मपूर्वक पालन कैसे करेगा? साथ ही आप यह भी सोचते हैं कि यदि मैं पिता की इस आज्ञा का पालन नहीं करूँ तो दूसरे लोग भी नहीं करेंगे। इस प्रकार धर्म की अवहेलना होने से जगत् के विनाश का भय उपस्थित होगा। इन सब दोषों और शङ्काओं का निराकरण करने के लिये आपके मन में वनगमन के प्रति जो यह बड़ा भारी सम्भ्रम (उतावलापन) आ गया है, यह सर्वथा अनुचित एवं भ्रममूलक ही है; क्योंकि आप असमर्थ ‘दैव’ नामक तुच्छ वस्तु को प्रबल बता रहे हैं। दैव का निराकरण करने में समर्थ आप-जैसा क्षत्रियशिरोमणि वीर यदि भ्रम में नहीं पड़ गया होता तो ऐसी बात कैसे कह सकता था? अतः असमर्थ पुरुषों द्वारा ही अपनाये जाने योग्य और पौरुष के निकट कुछ भी करनेमें असमर्थ ‘दैव’ की आप साधारण मनुष्य के समान इतनी स्तुति या प्रशंसा क्यों कर रहे हैं?
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Why don't you realise, O virtuous one that there are soft means of creating hindrances in their plan without trangressing dharma. You know dharma. Why don't you understand that their acts of deception wear the guise of dharma?
ShlokaShloka 8
यदि नैवं व्यवसितं स्याद्धि प्रागेव राघव।।2.23.9।।
तयोः प्रागेव दत्तश्च स्याद्वरः प्रकृतश्च सः।
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धर्मात्मन्! आपको उन दोनों पापियों पर संदेह क्यों नहीं होता? संसार में कितने ही ऐसे पापासक्त मनुष्य हैं, जो दूसरों को ठगने के लिये धर्म का ढोंग बनाये रहते हैं, क्या आप उन्हें नहीं जानते हैं?
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If both of them had not decided before, O Rama the boon granted to Kaikeyi naturally would have been fulfilled long ago.
ShlokaShloka 9
लोकविद्विष्टमारब्धं त्वदन्यस्याभिषेचनम्।
नोत्सहे सहितुं वीर तत्र मे क्षन्तुमर्हसि।।2.23.10।।
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रघुनन्दन! वे दोनों अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिये शठतावश धर्म के बहाने आप-जैसे सच्चरित्र पुरुष का परित्याग करना चाहते हैं। यदि उनका ऐसा विचार न होता तो जो कार्य आज हुआ है, वह पहले ही हो गया होता। यदि वरदान वाली बात सच्ची होती तो आपके अभिषेक का कार्य प्रारम्भ होने से पहले ही इस तरह का वर दे दिया गया होता
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The consecration of any one other than you, O valiant one is universally detested. I do not want to tolerate (this act). You should pardon me in this matter.
ShlokaShloka 10
येनेय मागता द्वैधं तव बुद्धिर्महामते।
स हि धर्मो मम द्वेष्यः प्रसङ्गाद्यस्य मुह्यसि।।2.23.11।।
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(गुणवान् ज्येष्ठ पुत्र के रहते हुए छोटे का अभिषेक करना) यह लोकविरुद्ध कार्य है, जिसका आज आरम्भ किया गया है। आपके सिवा दूसरे किसी का राज्याभिषेक हो, यह मुझसे सहन नहीं होग। इसके लिये आप मुझे क्षमा करेंगे॥१०॥
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O noble minded one I hate this righteousness which has deluded your intellect and created this dilemma about this issue.
ShlokaShloka 11
कथं त्वं कर्मणा शक्तः कैकेयीवशवर्तिनः।
करिष्यसि पितुर्वाक्यमधर्मिष्ठं विगर्हितम्।।2.23.12।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
महामते! पिता के जिस वचन को मानकर आप मोह में पड़े हुए हैं और जिसके कारण आपकी बुद्धि में दुविधा उत्पन्न हो गयी है, मैं उसे धर्म मानने का पक्षपाती नहीं हूँ; ऐसे धर्म का तो मैं घोर विरोध करता हूँ
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When you are able to counter (this move), why do you want to execute the unjustifiable and contemptible words of the king who is under the spell of Kaikeyi?
ShlokaShloka 12
यद्ययं किल्बिषाद्भेदः कृतोऽप्येवं न गृह्यते।
जायते तत्र मे दुःखं धर्मसङ्गश्च गर्हितः।।2.23.13।।
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आप अपने पराक्रमसे सब कुछ करनेमें समर्थ होकर भी कैकेयीके वशमें रहनेवाले पिताके अधर्मपूर्ण एवं निन्दित वचनका पालन कैसे करेंगे?
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I am grieved that even though this plot has been hatched by a treacherous mind, you are not taking it in the right perspective. Censurable is adherence to virtue.
ShlokaShloka 13
मनसाऽपि कथं कामं कुर्यास्त्वं कामवृत्तयोः।
तयोस्त्वहितयोर्नित्यं शत्र्वोः पित्रभिधानयोः।।2.23.14।।
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वरदान की झूठी कल्पना का पाप करके आपके अभिषेक में रोड़ा अटकाया गया है, फिर भी आप इस रूप में नहीं ग्रहण करते हैं। इसके लिये मेरे मन में बड़ा दुःख होता है। ऐसे कपटपूर्ण धर्म के प्रति होने वाली आसक्ति निन्दित है
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As both of them are steeped in passion, they never thought of your wellbeing. How will you fulfil the wishes of these enemies miscalled parents?
ShlokaShloka 14
यद्यपि प्रतिपत्तिस्ते दैवी चापि तयोर्मतम्।
तथाप्युपेक्षणीयं ते न मे तदपि रोचते।।2.23.15।।
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ऐसे पाखण्डपूर्ण धर्म के पालन में जो आपकी प्रवृत्ति हो रही है, वह यहाँ के जनसमुदाय की दृष्टि में निन्दित है। आपके सिवा दूसरा कोई पुरुष सदा पुत्र का अहित करने वाले, पिता-माता नामधारी उन कामाचारी शत्रुओं के मनोरथ को मन से भी कैसे पूर्ण कर सकता है (उसकी पूर्ति का विचार भी मन में कैसे ला सकता है?)
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It might be your opinion that their dictate is the decree of destiny. Even then, it does not satisfy me. It (destiny) should be ignored.
ShlokaShloka 15
विक्लबो वीर्यहीनो यस्स दैवमनुवर्तते।
वीरास्सम्भावितात्मानो न दैवं पर्युपासते।।2.23.16।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
माता-पिता के इस विचार को कि–’आपका राज्याभिषेक न हो’ जो आप दैव की प्रेरणा का फल मानते हैं, यह भी मुझे अच्छा नहीं लगता। यद्यपि वह आपका मत है, तथापि आपको उसकी उपेक्षा कर देनी चाहिये
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Those who are timid and cowardly alone depend on destiny.The valiant with of selfrespect will not accept it.
ShlokaShloka 16
दैवं पुरुषकारेण यः समर्थः प्रबाधितुम्।
न दैवेन विपन्नार्थः पुरुषस्सोऽवसीदति।।2.23.17।।
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जो कायर है, जिसमें पराक्रम का नाम नहीं है, वही दैव का भरोसा करता है। सारा संसार जिन्हें आदर की दृष्टि से देखता है, वे शक्तिशाली वीर पुरुष दैव की उपासना नहीं करते हैं॥१६
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In the case of one capable of striking destiny with human efforts it cannot defeat his objective and bring him despondency.
ShlokaShloka 17
द्रक्ष्यन्ति त्वद्य दैवस्य पौरुषं पुरुषस्य च।
दैवमानुषयोरद्य व्यक्ता व्यक्तिर्भविष्यति।।2.23.18।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
जो अपने पुरुषार्थ से दैव को दबाने में समर्थ है, वह पुरुष दैव के द्वारा अपने कार्य में बाधा पड़ने पर खेद नहीं करता—शिथिल होकर नहीं बैठता
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Today all will witness the power of destiny and the power of man. The difference between man and destiny will be manifested today.
ShlokaShloka 18
अद्य मत्पौरुषहतं दैवं द्रक्ष्यन्ति वै जनाः।
यद्दैवादाहतं तेऽद्य दृष्टं राज्याभिषेचनम्।।2.23.19।।
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आज संसार के लोग देखेंगे कि दैव की शक्ति बड़ी है या पुरुष का पुरुषार्थ। आज दैव और मनुष्य में कौन बलवान् है और कौन दुर्बल—इसका स्पष्ट निर्णय हो जायगा
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Today people will see destiny defeated by my valour just as they saw your consecration defeated (obstructed) by destiny.
ShlokaShloka 19
अत्यङ्कुशमिवोद्दामं गजं मदबलोद्धतम्।
प्रधावितमहं दैवं पौरुषेण निवर्तये।।2.23.20।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
जिन लोगों ने दैव के बलसे आज आपके राज्याभिषेक को नष्ट हुआ देखा है, वे ही आज मेरे पुरुषार्थ से अवश्य ही दैव का भी विनाश देख लेंगे
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I will make destiny, the elephant, running wild on the strength of the rut, unmanageable (even) by the goad, turn back with my valour.
ShlokaShloka 20
लोकपालास्समस्ता स्ते नाद्य रामाभिषेचनम्।
न च कृत्स्नास्त्रयो लोका विहन्युः किं पुनः पिता।।2.23.21।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
जो अङ्कश की परवा नहीं करता और रस्से या साँकल को भी तोड़ देता है, मद की धारा बहाने वाले उस मत्त गजराज की भाँति वेग पूर्वक दौड़ने वाले दैव को भी आज मैं अपने पुरुषार्थ से पीछे लौटा दूंगा॥२०॥
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All the guardians of the quarters and all the three worlds united cannot prevent the consecration of Rama today, what to speak of our father (king Dasaratha).
ShlokaShloka 21
यैर्निवासस्तवारण्ये मिथो राजन्समर्थितः।
अरण्ये ते निवत्स्यन्ति चतुर्दश समास्तथा।।2.23.22।।
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समस्त लोकपाल और तीनों लोकों के सम्पर्ण प्राणी आज श्रीराम के राज्याभिषेक को नहीं रोक सकते, फिर केवल पिताजी की तो बात ही क्या है?
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O king those who, with mutual support banished you to the forest, will themselves dwell in the forest for fourteen years.
ShlokaShloka 22
अहं तदाशां छेत्स्यामि पितुस्तस्याश्च या तव।
अभिषेकविघातेन पुत्रराज्याय वर्तते।।2.23.23।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
राजन्! जिन लोगों ने आपस में आपके वनवास का समर्थन किया है, वे स्वयं चौदह वर्षों तक वन में जाकर छिपे रहेंगे
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Therefore, I shall frustrate the desire of father and of Kaikeyi who plans the kingdom for her son by obstructing your consecration.
ShlokaShloka 23
मद्बलेन विरुद्धाय न स्याद्दैवबलं तथा।
प्रभविष्यति दुःखाय यथोग्रं पौरुषं मम।।2.23.24।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
मैं पिता की और जो आपके अभिषेक में विघ्न डालकर अपने पुत्र को राज्य देने के प्रयत्न में लगी हुई है, उस कैकेयी की भी उस आशा को जलाकर भस्म कर डालूँगा
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Any one who opposes my terrible valour will come to grief. The power of destiny will not cause that much sorrow as my valour will.
ShlokaShloka 24
ऊर्ध्वं वर्षसहस्रान्ते प्रजापाल्यमनन्तरम्।
आर्यपुत्राः करिष्यन्ति वनवासं गते त्वयि।।2.23.25।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
जो मेरे बल के विरोध में खड़ा होगा, उसे मेरा भयंकर पुरुषार्थ जैसा दुःख देने में समर्थ होगा, वैसा दैव बल उसे सुख नहीं पहुँचा सकेगा
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When after ruling the subjects for a thousand years you withdraw into the forest (for yativrata) your sons will rule them.
ShlokaShloka 25
पूर्वं राजर्षिवृत्त्या हि वनवासो विधीयते।
प्रजा निक्षिप्य पुत्रेषु पुत्रवत्परिपालने।।2.23.26।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
सहस्रों वर्ष बीतने के पश्चात् जब आप अवस्था क्रम से वन में निवास करने के लिये जायेंगे, उस समय आपके बाद आपके पुत्र प्रजापालनरूप कार्य करेंगे (अर्थात् उस समय भी दूसरों को इस राज्य में दखल देने का अवसर नहीं प्राप्त होगा)
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Leaving their sons to look after the subjects as their own children, the rajarsis in ancient times used to retire into the forest as per practice.
ShlokaShloka 26
स चेद्राजन्यनेकाग्रे राज्यविभ्रमशङ्कया।
नैवमिच्छसि धर्मात्मन् राज्यं राम त्वमात्मनि।।2.23.27।।
प्रतिजाने च ते वीर माऽभूवं वीरलोकभाक्।
राज्यं च तव रक्षेयमहं वेलेव सागरम्।।2.23.28।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
पुरातन राजर्षियों की आचारपरम्परा के अनुसार प्रजा का पुत्रवत् पालन करने के निमित्त प्रजावर्ग को पुत्रों के हाथ में सौंपकर वृद्ध राजा का वन में निवास करना उचित बताया जाता है
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O righteous one, if you apprehend chaos in the kingdom for want of wholehearted support from the (feudatory) kings then, O my valiant brother, I swear to you, I will protect your kingdom like the shore protecting the ocean. Or else, I shall never attain the afterworld of heroes.
ShlokaShloka 27
मङ्गलैरभिषिञ्चस्व तत्र त्वं व्यापृतो भव।
अहमेको महीपालानलं वारयितुं बलात्।।2.23.29।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
धर्मात्मा श्रीराम! हमारे महाराज वानप्रस्थधर्म के पालन में चित्त को एकाग्र नहीं कर रहे हैं, इसीलिये यदि आप यह समझते हों कि उनकी आज्ञा के विरुद्ध राज्य ग्रहण कर लेने पर समस्त जनता विद्रोही हो जायगी, अतः राज्य अपने हाथ में नहीं रह सकेगा और इसी शङ्का से यदि आप अपने ऊपर राज्यकाभार नहीं लेना चाहते हैं अथवा वन में चले जाना चाहते हैं तो इस शङ्का को छोड़ दीजिये
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The consecration may be performed with these auspicious materials. I am alone capable of facing these kings with my valour.
ShlokaShloka 28
न शोभार्थाविमौ बाहू न धनुर्भूषणाय मे।
नाऽसिराबन्धनार्थाय न शरास्तम्भहेतवः।।2.23.30।।
अमित्रदमनार्थं मे सर्वमेतच्चतुष्टयम्।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
वीर! मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि जैसे तटभूमि समुद्र को रोके रहती है, उसी प्रकार मैं आपकी और आपके राज्य की रक्षा करूँगा। यदि ऐसा न करूँ तो वीरलोक का भागी न होऊँ
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These my arms are not intended to enhance the beauty (of my body). This bow is not for decoration. The sword is not for the sake of strapping my waist. The arrows are not meant to be fixed to my quiver. All these four are meant for taming my enemies.
ShlokaShloka 29
न चाहं कामयेऽत्यर्थं यस्स्याच्छत्रुर्मतो मम।।2.23.31।।
असिना तीक्ष्णधारेण विद्युच्चलितवर्चसा।
प्रगृहीतेन वै शत्रुं वज्रिणं वा न कल्पये।।2.23.32।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
इसलिये आप मङ्गलमयी अभिषेक-सामग्री से अपना अभिषेक होने दीजिये। इस अभिषेक के कार्य में आप तत्पर हो जाइये। मैं अकेला ही बलपूर्वक समस्त विरोधी भूपालों को रोक रखनेमें समर्थ हूँ
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Any one who turns my enemy will not be allowed to remain alive. Holding my sharpedged sword, lustrous as a flash of lightning, I shall exterminate my enemy even if it were Indra, the bearer of thunder.
ShlokaShloka 30
खड्गनिष्पेषनिष्पिष्टैर्गहना दुश्चरा च मे।
हस्त्यश्वनरहस्तोरुशिरोभिर्भविता मही।।2.23.33।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
ये मेरी दोनों भुजाएँ केवल शोभा के लिये नहीं हैं। मेरे इस धनुष का आभूषण नहीं बनेगा। यह तलवार केवल कमर में बाँधे रखने के लिये नहीं है तथा इन बाणों के खम्भे नहीं बनेंगे॥३०॥
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This entire earth will become impenetrable and impassable, scattered with the trunks, thighs and heads of elephants, horses and warriors hacked off with my sword.
ShlokaShloka 31
खड्गधाराहता मेऽद्य दीप्यमाना इवाद्रयः।
पतिष्यन्ति द्विपा भूमौ मेघा इव सविद्युतः।।2.23.34।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
ये सब चारों वस्तुएँ शत्रुओं का दमन करने के लिये ही हैं। जिसे मैं अपना शत्रु समझता हूँ, उसे कदापि जीवित रहने देना नहीं चाहता
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The elephants, struck by the blows of my sword, will fall on earth like mountains engulfed in flames and like clouds with lightning.
ShlokaShloka 32
बद्धगोधाङ्गुलित्राणे प्रगृहीतशरासने।
कथं पुरुषमानी स्यात्पुरुषाणां मयि स्थिते।।2.23.35।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
जिस समय मैं इस तीखी धारवाली तलवार को हाथ में लेता हूँ, यह बिजली की तरह चञ्चल प्रभा से चमक उठती है। इसके द्वारा अपने किसी भी शत्रु को, वह वज्रधारी इन्द्र ही क्यों न हो, मैं कुछ नहीं समझता
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When I stand before men (enemies) wearing godha and fingerprotector, holding the bow ready, who amongst men will boast of his manliness?
ShlokaShloka 33
बहुभिश्चैकमत्यस्यन्नेकेन च बहून्जनान्।
विनियोक्ष्याम्यहं बाणान्नृवाजिगजमर्मसु।।2.23.36।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
आज मेरे खड्ग के प्रहार से पीस डाले गये हाथी,घोड़े और रथियों के हाथ, जाँघ और मस्तकों द्वारा पटी हुई यह पृथ्वी ऐसी गहन हो जायगी कि इस पर चलना-फिरना कठिन हो जायगा
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Striking each of my foes with many arrows and many with one arrow, I shall aim them at the vitals of men, horses and elephants.
ShlokaShloka 34
अद्य मेऽस्त्रप्रभावस्य प्रभावः प्रभविष्यति।
राज्ञश्चाप्रभुतां कर्तुं प्रभुत्वं तव च प्रभोः।।2.23.37।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
मेरी तलवार की धार से कटकर रक्त से लथपथ हुए शत्रु जलती हुई आग के समान जान पड़ेंगे और बिजली सहित मेघों के समान आज पृथ्वी पर गिरेंगे
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O Lord today you shall see the power of my glorious weapons in depriving the king (Dasaratha) of his authority and establishing your supremacy over the kingdom.
ShlokaShloka 35
अद्य चन्दनसारस्य केयूरामोक्षणस्य च।
वसूनां च विमोक्षस्य सुहृदां पालनस्य च।।2.23.38।।
अनुरूपाविमौ बाहू राम कर्म करिष्यतः।
अभिषेचनविघ्नस्य कर्तृ़णां ते निवारणे।।2.23.39।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
अपने हाथों में गोह के चर्म से बने हुए दस्ताने को बाँधकर जब हाथ में धनुष ले मैं युद्ध के लिये खड़ा हो जाऊँगा, उस समय पुरुषों से कोई भी मेरे सामने कैसे अपने पौरुष पर अभिमान कर सकेगा?
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These arms, O Rama which are fit for sandalwood cream, for wearing armlets, for distributing wealth and for protecting friends, will perform the worthy act of subduing those who are creating obstruction to your consecration.
ShlokaShloka 36
ब्रवीहि कोऽद्यैव मया वियुज्यताम्
तवा सुहृत्प्राणयशस्सुहृज्जनैः।
यथा तवेयं वसुधा वशे भवे
त्तथैव मां शाधि तवास्मि किङ्करः।।2.23.40।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
मैं बहुत-से बाणों द्वारा एक को और एक ही बाण से बहुत-से योद्धाओं को धराशायी करता हुआ मनुष्यों, घोड़ों और हाथियों के मर्मस्थानों पर बाण मारूँगा
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Tell me your enemy who should be deprived of his life, fame and friends. Command me as to how this earth shall come under your control. Now itself I shall do that. I am your servant.
ShlokaShloka 37
विमृज्य बाष्पं परि���ान्त्व्यचासकृत्
स लक्ष्मणं राघववंशवर्धनः।
उवाच पित्र्ये वचने व्यवस्थितं
निबोध मामेष हि सौम्य सत्पथः।।2.23.41।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
प्रभो! आज राजा दशरथ की प्रभुता को मिटाने और आपके प्रभुत्व की स्थापना करने के लिये अस्त्रबल से सम्पन्न मुझ लक्ष्मण का प्रभाव प्रकट होगा
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Wiping the tears again and again and having consoled Lakshmana for more than once, Rama, the enhancer of the glory of the Raghu dynasty said, O handsome one know, for sure, that I am firm in abiding by the words of our father. This is the true path (for me). इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे त्रयोविंशस्सर्गः।। Thus ends the twentythird sarga of Ayodhyakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.