Ayodhya Kanda
Sarga 113: Return of Bharata and Satrughna with Rama's sandals as the representative of Rama.
अयोध्याकाण्डम् · सर्ग 113
24 shlokas
ShlokaShloka 1
तत श्शिरसि कृत्वा तु पादुके भरतस्तदा।
आरुरोह रथं हृष्टः शत्रुघ्नेन समन्वितः।।2.113.1।।
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तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी की दोनों चरणपादुकाओं को अपने मस्तक पर रखकर भरत शत्रुघ्न के साथ प्रसन्नता-पूर्वक रथ पर बैठे
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Then Bharata accompanied by Satrughna, placing the sandals on his head in delight, boarded the chariot.
ShlokaShloka 2
वसिष्ठो वामदेवश्च जाबालिश्च दृढव्रतः।
अग्रतः प्रययु स्सर्वे मन्त्रिणो मन्त्रपूजिताः।।2.113.2।।
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वसिष्ठ, वामदेव तथा दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रत का पालन करने वाले जाबालि आदि सब मन्त्री, जो उत्तम मन्त्रणा देने के कारण सम्मानित थे, आगे-आगे चले
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Vasishta, Vamadeva, Jabali of rigorous penance and all the ministers honoured for their counsel proceeded ahead.
ShlokaShloka 3
मन्दाकिनीं नदीं रम्यां प्राङ्मुखास्ते ययुस्तदा।
प्रदक्षिणं च कुर्वाणाश्चित्रकूटं महागिरिम्।।2.113.3।।
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वे सब लोग चित्रकूट नामक महान् पर्वत की परिक्रमा करते हुए परम रमणीय मन्दाकिनी नदी को पार करके पूर्व दिशा की ओर प्रस्थित हुए
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All of them circumambulated the mighty mountain Chitrakuta and proceeded east towards the charming river Mandakini.
ShlokaShloka 4
पश्यन्धातुसहस्राणि रम्याणि विविधानि च।
प्रययौ तस्य पार्श्वेन ससैन्यो भरतस्तदा।।2.113.4।।
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उस समय भरत अपनी सेना के साथ सहस्रों प्रकार के रमणीय धातुओं को देखते हुए चित्रकूट के किनारे से होकर निकले
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Beholding a thousand varieties of beautiful minerals, Bharata with his army proceeded alongside the mountain.
ShlokaShloka 5
अदूराच्चित्रकूटस्य ददर्श भरतस्तदा।
आश्रमं यत्र स मुनिर्भरद्वाजः कृतालयः।।2.113.5।।
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अपने कुल को आनन्दित करने वाले पराक्रमी भरत महर्षि भरद्वाज के उस आश्रमपर पहुँचकर रथ से उतर पड़े और उन्होंने मुनि के चरणों में प्रणाम किया
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Not far from Chitrakuta mountain, Bharata beheld a hermitage where sage Bharadwaja resided.
ShlokaShloka 6
स तमाश्रममागम्य भरद्वाजस्य बुद्धिमान्।
अवतीर्य रथात्पादौ ववन्दे भरतस्तदा।।2.113.6।।
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अपने कुल को आनन्दित करने वाले पराक्रमी भरत महर्षि भरद्वाज के उस आश्रमपर पहुँचकर रथ से उतर पड़े और उन्होंने मुनि के चरणों में प्रणाम किया
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On approaching the hermitage of sage Bharadwaja, Bharata alighted from the chariot, and prostrated at his feet.
ShlokaShloka 7
ततो हृष्टो भरद्वाजो भरतं वाक्यमब्रवीत्।
अपि कृत्यं कृतं तात रामेण च समागतम्।।2.113.7।।
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उनके आने से महर्षि भरद्वाज को बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने भरत से पूछा—’तात! क्या तुम्हारा कार्य सम्पन्न हुआ? क्या श्रीरामचन्द्रजी से भेंट हुई?’
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Then Bhardwaja asked Bharata in delight, My son, have you accomplished your task? Did you meet Rama?
ShlokaShloka 8
एवमुक्त स्स तु ततो भरद्वाजेन धीमता।
प्रत्युवाच भरद्वाजं भरतो धर्मवत्सलः।।2.113.8।।
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बुद्धिमान् भरद्वाजजी के इस प्रकार पूछने पर धर्मवत्सल भरत ने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया-
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Having been thus addressed by wise Bharadwaja, Bharata, devoted to righteousness, replied:
ShlokaShloka 9
स याच्यमानो गुरुणा मया च दृढविक्रमः।
राघवः परमप्रीतो वसिष्ठं वाक्यमब्रवीत��।।2.113.9।।
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‘मुने! भगवान् श्रीराम अपने पराक्रम पर दृढ़ रहने वाले हैं। मैंने उनसे बहुत प्रार्थना की। गुरुजी ने भी अनुरोध किया तब उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न होकर गुरुदेव वसिष्ठजी से इस प्रकार कहा-
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Entreated by me and by preceptor (Vasistha), the highly pleased Rama with his firmness of mind replied to Vasistha:
ShlokaShloka 10
पितुः प्रतिज्ञां तामेव पालयिष्यामि तत्त्वतः।
चतुर्दश हि वर्षाणि या प्रतिज्ञा पितुर्मम।।2.113.10।।
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‘मैं चौदह वर्षों तक वन में रहूँ, इसके लिये मेरे पिताजी ने जो प्रतिज्ञा कर ली थी, उनकी उस प्रतिज्ञाका ही मैं यथार्थ रूप से पालन करूँगा’
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In sooth, I shall honour the words of promise given by my father and live in the forest for fourteen years, as promised.
ShlokaShloka 11
एवमुक्तो महाप्राज्ञो वसिष्ठः प्रत्युवाच ह।
वाक्यज्ञो वाक्यकुशलं राघवं वचनं महत्।।2.113.11।।
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‘उनके ऐसा कहने पर बात के मर्म को समझने वाले महाज्ञानी वसिष्ठजी ने बातचीत करने में कुशल श्रीरघुनाथजी से यह महत्त्वपूर्ण बात कही—
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On hearing him, Vasistha a great intellectual and highly eloquent one replied to Rama, skilled in words of deep significance.
ShlokaShloka 12
एते प्रयच्छ संहृष्टः पादुके हेमभूषिते।
अयोध्यायां महाप्राज्ञ योगक्षेमकरे तव।।2.113.12।।
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‘गुरु वसिष्ठजी के ऐसा कहने पर पूर्वाभिमुख खड़े हुए श्रीरघुनाथजी ने अयोध्या वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, "अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या"और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन (लगभग १४४ कि.मी) लम्बाई अाैर तीन योजन (लगभग ३६ कि.मी.) चौड़ाई में बसी थी । कई शताब्दी तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। " href="https://www.ramcharit.in/glossary/%e0%a4%85%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/" data-gt-translate-attributes='[{"attribute":"data-cmtooltip", "format":"html"}]' tabindex='0' role='link'>अयोध्या के राज्य का संचालन करने के लिये ये दोनों स्वर्णभूषित पादुकाएँ मुझे दे दीं
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O extremely sagacious one, bestow with pleasure your sandals decked with gold for security and safety of Ayodhya.
ShlokaShloka 13
एवमुक्तो वसिष्ठेन राघवः प्राङ्मुखः स्थितः।
पादुके ह्यधिरुह्यैते मम राज्याय वै ददौ।।2.113.13।।
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‘गुरु वसिष्ठजी के ऐसा कहने पर पूर्वाभिमुख खड़े हुए श्रीरघुनाथजी ने अयोध्या वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, "अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या"और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन (लगभग १४४ कि.मी) लम्बाई अाैर तीन योजन (लगभग ३६ कि.मी.) चौड़ाई में बसी थी । कई शताब्दी तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। " href="https://www.ramcharit.in/glossary/%e0%a4%85%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/" data-gt-translate-attributes='[{"attribute":"data-cmtooltip", "format":"html"}]' tabindex='0' role='link'>अयोध्या के राज्य का संचालन करने के लिये ये दोनों स्वर्णभूषित पादुकाएँ मुझे दे दीं
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Thus addressed by Vasistha, Rama stood facing eastward wearing these sandals. and bestowed them on me for the sake of ruling the kingdom.
ShlokaShloka 14
निवृत्तोऽहमनुज्ञातो रामेण सुमहात्मना।
अयोध्यामेव गच्छामि गृहीत्वा पादुके शुभे।।2.113.14।।
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‘तत्पश्चात् मैं महात्मा श्रीराम की आज्ञा पाकर लौट आया हूँ और उनकी इन मङ्गलमयी चरणपादुकाओं को लेकर अयोध्या वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, "अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या"और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन (लगभग १४४ कि.मी) लम्बाई अाैर तीन योजन (लगभग ३६ कि.मी.) चौड़ाई में बसी थी । कई शताब्दी तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। " href="https://www.ramcharit.in/glossary/%e0%a4%85%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/" data-gt-translate-attributes='[{"attribute":"data-cmtooltip", "format":"html"}]' tabindex='0' role='link'>अयोध्या को ही जा रहा हूँ’
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I am now returning to Ayodhya with these auspicious sandals permitted by the magnanimous Rama.
ShlokaShloka 15
एतच्छ्रुत्वा शुभं वाक्यं भरतस्य महात्मनः।
भरद्वाजश्शुभतरं मुनिर्वाक्यमुवाच तम्।।2.113.15।।
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महात्मा भरत का यह शुभ वचन सुनकर भरद्वाज मुनि ने यह परम मङ्गलमय बात कही—
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Hearing the auspicious words of the magnanimous Bharata, sage Bharadwaja said to him in words still more auspicious.
ShlokaShloka 16
नैतच्चित्रं नरव्याघ्र शीलवृत्तवतां वर।
यदार्यं त्वयि तिष्ठेत्तु निम्ने सृष्टमिवोदकम्।।2.113.16।।
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‘भरत! तुम मनुष्यों में सिंह के समान वीर तथा शील और सदाचार के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ हो। जैसे जल नीची भूमि वाले जलाशय में सब ओर से बहकर चला आता है, उसी प्रकार तुममें सारे श्रेष्ठ गुण स्थित हों यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है
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O best of men, foremost among men of excellent character and dispositon, it is not surprising that all noble qualities come to reside in you naturally like water poured flowing downward.
ShlokaShloka 17
अमृत स्समहाबाहुः पिता दशरथस्तव।
यस्य त्वमीदृश: पुत्रो धर्मज्ञो धर्मवत्सलः।।2.113.17।।
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‘तुम्हारे पिता महाबाहु राजा दशरथ सब प्रकार से उऋण हो गये, जिनके तुम-जैसा धर्म प्रेमी एवं धर्मात्मा पुत्र है’
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With you as his son, endowed with qualities of righteousness and devotion to duty, your mightyarmed father Dasaratha is not dead. (He lives through you).
ShlokaShloka 18
तमृषिं तु महात्मानमुक्तवाक्यं कृताञ्जलिः।
आमन्त्रयितुमारेभे चरणावुपगृह्य च।।2.113.18।।
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उन महाज्ञानी महर्षि के ऐसा कहने पर भरत ने हाथ जोड़कर उनके चरणों का स्पर्श किया; फिर वे उनसे जाने की आज्ञा लेने को उद्यत हुए
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Hearing the words of the magnanimous Bharadwaja, Bharata paid his respect, folding his palms, and clasping the feet of the sage and sought his permission to leave.
ShlokaShloka 19
ततः प्रदक्षिणं कृत्वा भरद्वाजं पुनः पुनः।
भरतस्तु ययौ श्रीमानयोध्यां सह मन्त्रिभिः।।2.113.19।।
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तदनन्तर श्रीमान् भरत बारंबार भरद्वाज मुनि की परिक्रमा करके मन्त्रियों सहित अयोध्या वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, "अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या"और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन (लगभग १४४ कि.मी) लम्बाई अाैर तीन योजन (लगभग ३६ कि.मी.) चौड़ाई में बसी थी । कई शताब्दी तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। " href="https://www.ramcharit.in/glossary/%e0%a4%85%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/" data-gt-translate-attributes='[{"attribute":"data-cmtooltip", "format":"html"}]' tabindex='0' role='link'>अयोध्या की ओर चल दिये
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Then illustrious Bharata circumambulated the sage several times in homage before he set out for Ayodhya with his counsellors.
ShlokaShloka 20
यानैश्च शकटैश्चैव हयैर्नागैश्च सा चमूः।
पुनर्निवृत्ता विस्तीर्णा भरतस्यानुयायिनी।।2.113.20 ।।
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फिर वह विस्तृत सेना रथों, छकड़ों, घोड़ों और हाथियों के साथ भरत का अनुसरण करती हुई अयोध्या वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, "अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या"और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन (लगभग १४४ कि.मी) लम्बाई अाैर तीन योजन (लगभग ३६ कि.मी.) चौड़ाई में बसी थी । कई शताब्दी तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। " href="https://www.ramcharit.in/glossary/%e0%a4%85%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/" data-gt-translate-attributes='[{"attribute":"data-cmtooltip", "format":"html"}]' tabindex='0' role='link'>अयोध्या को लौटी
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The vast army of Bharata with all its carriages, carts, horses and elephants following him again turned back towards Ayodhya.
ShlokaShloka 21
ततस्ते यमुनां दिव्यां नदीं तीर्त्वोर्मिमालिनीम्।
ददृशुस्तां पुन स्सर्वे गङ्गां शुभजलां नदीम्।।2.113.21।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
तत्पश्चात् आगे जाकर उन सब लोगों ने तरंगमालाओं से सुशोभित दिव्य नदी यमुना को पार करके पुनः शुभसलिला गङ्गाजी का दर्शन किया
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Thereafter, all of them crossed the divine river Yamuna wreathed in waves and, beheld the Ganga of sacred waters once again.
ShlokaShloka 22
तां रम्यजलसंपूर्णां सन्तीर्य सहबान्धवः
शृङ्गिबेरपुरं रम्यं प्रविवेश ससैनिकः।
शृङ्गिबेरपुराद्भूय स्त्वयोध्यां सन्ददर्श ह।।2.113.22।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
फिर बन्धु-बान्धवों और सैनिकों के साथ मनोहर जल से भरी हुई गङ्गा के भी पार होकर वे परम रमणीय शृङ्गवेरपुर में जा पहुँचे
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Bharata along with his kins and his army crossed the Ganga with its overflowing, wonderful waters and entered the beautiful city of Sringiberapura and from there he proceeded until he beheld the city of Ayodhya.
ShlokaShloka 23
अयोध्यां च ततो दृष्ट्वा पित्रा भ्रात्रा विवर्जिताम्।
भरतो दुःख सन्तप्त स्सारथिं चेदमब्रवीत्।।2.113.23।।
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On seeing the city of Ayodhya bereft of his father and brothers, Bharata, consumed with grief, said to the charioteer:
ShlokaShloka 24
सारथे पश्य विध्वस्ता साऽयोध्या न प्रकाशते।
निराकारा निरानन्दा दीना प्रतिहतस्वरा।।2.113.24।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘सारथि सुमन्त्रजी! देखिये, अयोध्या वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, "अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या"और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन (लगभग १४४ कि.मी) लम्बाई अाैर तीन योजन (लगभग ३६ कि.मी.) चौड़ाई में बसी थी । कई शताब्दी तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। " href="https://www.ramcharit.in/glossary/%e0%a4%85%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/" data-gt-translate-attributes='[{"attribute":"data-cmtooltip", "format":"html"}]' tabindex='0' role='link'>अयोध्या की सारी शोभा नष्ट हो गयी है; अतः यह पहले की भाँति प्रकाशित नहीं होती है। इसका वह सुन्दर रूप, वह आनन्द जाता रहा। इस समय यह अत्यन्त दीन और नीरव हो रही है’
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O charioteer, look, Ayodhya is in shapeless shambles. It is silent and cheerless. It is dull and desolate. It shines no more. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे त्रयोदशोरशततमस्सर्गः। Thus ends the hundredthirteenth sarga in Ayodhyakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.