Ayodhya Kanda

Sarga 79: Bharata is asked to accept the throne -- orders construction of road into the forest -- gets ready to bring back Rama.

अयोध्याकाण्डम् · सर्ग 79

17 shlokas

ShlokaShloka 1
ततः प्रभातसमये दिवसेऽथ चतुर्दशे। समेत्य राजकर्तारो भरतं वाक्यमब्रुवन्।।2.79.1।।
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तदनन्तर चौदहवें दिन प्रातःकाल समस्त राजकर्मचारी मिलकर भरत से इस प्रकार बोले-
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Then, at the hour of dawn on the fourteenth day, all those who were empowered to proclaim the king, assembled and addressed Bharata:
ShlokaShloka 2
गतो दशरथस्स्वर्गं यो नो गुरुतरो गुरुः। रामं प्रव्राज्य वै ज्येष्ठं लक्ष्मणं च महाबलम्।।2.79.2।।
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‘महायशस्वी राजकुमार ! जो हमारे सर्वश्रेष्ठ गुरु थे, वे महाराज दशरथ तो अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम तथा महाबली लक्ष्मण को वन में भेजकर स्वयं स्वर्गलोक को चले गये, अब इस राज्य का कोई स्वामी नहीं है; इसलिये अब आप ही हमारे राजा हों। आपके बड़े भाई को स्वयं महाराज ने वनवास की आज्ञा दी और आपको यह राज्य प्रदान किया ! अतः आपका राजा होना न्यायसङ्गत है। इस सङ्गति के कारण ही आप राज्य को अपने अधिकार में लेकर किसी के प्रति कोई अपराध नहीं कर रहे हैं
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Dasaratha, who was our most revered master and preceptor, having exiled his eldest son Rama and mighty Lakshmana, ascended heaven.
ShlokaShloka 3
त्वमद्य भव नो राजा राजपुत्र महायशः। सङ्गत्या नापराध्नोति राज्यमेतदनायकम्।।2.79.3।।
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‘महायशस्वी राजकुमार ! जो हमारे सर्वश्रेष्ठ गुरु थे, वे महाराज दशरथ तो अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम तथा महाबली लक्ष्मण को वन में भेजकर स्वयं स्वर्गलोक को चले गये, अब इस राज्य का कोई स्वामी नहीं है; इसलिये अब आप ही हमारे राजा हों। आपके बड़े भाई को स्वयं महाराज ने वनवास की आज्ञा दी और आपको यह राज्य प्रदान किया ! अतः आपका राजा होना न्यायसङ्गत है। इस सङ्गति के कारण ही आप राज्य को अपने अधिकार में लेकर किसी के प्रति कोई अपराध नहीं कर रहे हैं
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O illutrious prince do assume kingship now. Incidentally, there has been yet no attack on this leaderless kingdom.
ShlokaShloka 4
अभिषेचनिकं सर्वमिदमादाय राघव। प्रतीक्षते त्वां स्वजनश्श्रेणयश्च नृपात्मज।।2.79.4।।
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‘राजकुमार रघुनन्दन! ये मन्त्री आदि स्वजन, पुरवासी तथा सेठलोग अभिषेक की सब सामग्री लेकर आपकी राह देखते हैं
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O prince of the Raghu race (Bharata), your subjects and guilds of traders, artisans, etc, have procured necessary materials for your consecration, and await you.
ShlokaShloka 5
राज्यं गृहाण भरत पितृपैतामहं ध्रुवम्। अभिषेचय चात्मानं पाहि चास्मान्नरर्षभ।।2.79.5।।
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यह सुनकर उत्तम व्रत को धारण करने वाले भरत ने अभिषेक के लिये रखी हुई कलश आदि सब सामग्री की प्रदक्षिणा की और वहाँ उपस्थित हुए सब लोगों को इस प्रकार उत्तर दिया-
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O best among men, inherit this stable kingdom of your ancestors, get yourself consecrated and save us.
ShlokaShloka 6
अभिषेचनिकं भाण्डं कृत्वा सर्वं प्रदक्षिणम्। भरतस्तं जनं सर्वं प्रत्युवाच धृतव्रतः।।2.79.6।।
हिन्दी अर्थ देखें
यह सुनकर उत्तम व्रत को धारण करने वाले भरत ने अभिषेक के लिये रखी हुई कलश आदि सब सामग्री की प्रदक्षिणा की और वहाँ उपस्थित हुए सब लोगों को इस प्रकार उत्तर दिया-
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Bharata, firm in vows, circumambulated all the articles procured in connection with consecration, and replied them as follows:
ShlokaShloka 7
ज्येष्ठस्य राजता नित्यमुचिता हि कुलस्य नः। नैवं भवन्तो मां वक्तुमर्हन्ति कुशला जनाः।।2.79.7।।
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‘सज्जनो! आपलोग बुद्धिमान् हैं, आपको मुझसे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। हमारे कुल में सदा ज्येष्ठ पुत्र ही राज्य का अधिकारी होता आया है और यही उचित भी है
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It has been the tradition in our race that the eldest son alone should always inherit the kingdom. It does not behove intelligent people like you to tell me like this.
ShlokaShloka 8
रामः पूर्वो हि नो भ्राता भविष्यति महीपतिः। अहं त्वरण्ये वत्स्यामि वर्षाणि नव पञ्च च।।2.79.8।।
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‘श्रीरामचन्द्रजी हमलोगों के बड़े भाई हैं, अतः वे ही राजा होंगे। उनके बदले मैं ही चौदह वर्षों तक वन में निवास करूँगा
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Our eldest brother, Rama shall become king. As for me, I shall dwell in the forest for fourteen years.
ShlokaShloka 9
युज्यतां महती सेना चतुरङ्गमहाबला। आनयिष्याम्यहं ज्येष्ठं भ्रातरं राघवं वनात्।।2.79.9।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘आपलोग विशाल चतुरङ्गिणी सेना, जो सब प्रकार से सबल हो, तैयार कीजिये। मैं अपने ज्येष्ठ भ्राता श्रीरामचन्द्रजी को वन से लौटा लाऊँगा
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Let the great and powerful army of four divisions be marshalled. I will bring back my eldest brother Rama from the forest.
ShlokaShloka 10
अभिषेचनिकं चैव सर्वमेतदुपस्कृतम्। पुरस्कृत्य गमिष्यामि रामहेतोर्वनं प्रति।।2.79.10।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘अभिषेक के लिये संचित हुई इस सारी सामग्री को आगे करके मैं श्रीराम से मिलने के लिये वन में चलूँगा और उन नरश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी का वहीं अभिषेक करके यज्ञ से लायी जाने वाली अग्नि के समान उन्हें आगे करके अयोध्या वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, "अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या"और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन (लगभग १४४ कि.मी) लम्बाई अाैर तीन योजन (लगभग ३६ कि.मी.) चौड़ाई में बसी थी । कई शताब्दी तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। " href="https://www.ramcharit.in/glossary/%e0%a4%85%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/" data-gt-translate-attributes='[{"attribute":"data-cmtooltip", "format":"html"}]' tabindex='0' role='link'>अयोध्या में ले आऊँगा
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I shall go to the forest to (bring back) Rama, with all these articles, procured for coronation kept in front.
ShlokaShloka 11
तत्रैवं तं नरव्याघ्रमभिषिच्य पुरस्कृतम्। आनेष्यामि तु वै रामं हव्यवाहमिवाध्वरात्।।2.79.11।
हिन्दी अर्थ देखें
‘अभिषेक के लिये संचित हुई इस सारी सामग्री को आगे करके मैं श्रीराम से मिलने के लिये वन में चलूँगा और उन नरश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी का वहीं अभिषेक करके यज्ञ से लायी जाने वाली अग्नि के समान उन्हें आगे करके अयोध्या वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, "अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या"और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन (लगभग १४४ कि.मी) लम्बाई अाैर तीन योजन (लगभग ३६ कि.मी.) चौड़ाई में बसी थी । कई शताब्दी तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। " href="https://www.ramcharit.in/glossary/%e0%a4%85%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/" data-gt-translate-attributes='[{"attribute":"data-cmtooltip", "format":"html"}]' tabindex='0' role='link'>अयोध्या में ले आऊँगा
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After coronating Rama, the best of men, there itself, I will definitely bring him back, letting him go ahead of me, like the sacred fire carried from the place of sacrifice.
ShlokaShloka 12
न सकामां करिष्यामि स्वामिमां मातृगन्धिनीम्। वने वत्स्याम्यहं दुर्गे रामो राजा भविष्यति।।2.79.12।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘परंतु जिसमें लेशमात्र मातृभाव शेष है, अपनी माता कहलाने वाली इस कैकेयी को मैं कदापि सफल मनोरथ नहीं होने दूंगा। श्रीराम यहाँ के राजा होंगे और मैं दुर्गम वन में निवास करूँगा
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I shall never fulfil the wishes of that woman called my mother. I shall dwell in the inaccessible forest and Rama shall become king.
ShlokaShloka 13
क्रियतां शिल्पिभिः पन्था स्समानि विषमाणि च। रक्षिणश्चानुसम्यान्तु पथि दुर्गविचारकाः।।2.79.13।।
हिन्दी अर्थ देखें
श्रीरामचन्द्रजी के लिये ऐसी बातें कहते हुए राजकुमार भरत से वहाँ आये हुए सब लोगों ने इस प्रकार सुन्दर एवं परम उत्तम बात कही-
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Let the road be aligned by artisans and uneven ground be levelled. The guards who judge the inaccessible terrains should follow them on their way.
ShlokaShloka 14
एवं सम्भाषमाणं तं रामहेतोर्नृपात्मजम्। प्रत्युवाच जनस्सर्व श्श्रीमद्वाक्यमनुत्तमम्।।2.79.14।।
हिन्दी अर्थ देखें
श्रीरामचन्द्रजी के लिये ऐसी बातें कहते हुए राजकुमार भरत से वहाँ आये हुए सब लोगों ने इस प्रकार सुन्दर एवं परम उत्तम बात कही-
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When prince Bharata was thus speaking in favour of Rama, all the people responded with these excellent, propitious words:
ShlokaShloka 15
एवं ते भाषमाणस्य पद्मा श्रीरुपतिष्ठतात्। यस्त्वं ज्येष्ठे नृपसुते पृथिवीं दातुमिच्छसि।।2.79.15।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘भरतजी! ऐसे उत्तम वचन कहने वाले आपके पास कमलवन में निवास करने वाली लक्ष्मी अवस्थित हों क्योंकि आप राजा के ज्येष्ठ पुत्र श्रीरामको स्वयं ही इस पृथिवीका राज्य लौटा देना चाहते हैं’
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May Lakshmi, goddess of prosperity, abide in you for having expressed your desire to bestow the kingdom upon the king's eldest son.
ShlokaShloka 16
अनुत्तमं तद्वचनं नृपात्मजप्रभाषितं संश्रवणे निशम्य च। प्रहर्षजास्तं प्रति बाष्पबिन्दवो निपेतुरार्यानननेत्रसम्भवाः।।2.79.16।।
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With such graceful words spoken by the prince within their hearing, tears of joy filled the eyes of the noble people and fell drop by drop down their faces.
ShlokaShloka 17
ऊचुस्ते वचनमिदं निशम्य हृष्टा स्सामात्या स्सपरिषदो वियातशोकाः। पन्थानं नरवर भक्तिमान् जनश्च व्यादिष्टस्तव वचनाच्च शिल्पिवर्गः।।2.79.17।
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All the ministers and members of the council, relieved of their distress, were delighted to hear these words and said O best among men, on your orders devoted people and groups of artisans have been instructed to lay the road. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे एकोनाशीतितमस्सर्गः।। Thus ends the seventyninth sarga in Ayodhyakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.