Ayodhya Kanda

Sarga 118: Sita relates the story of her marriage to Anasuya -- Anasuya bestows Sita with divine gifts.

अयोध्याकाण्डम् · सर्ग 118

52 shlokas

ShlokaShloka 1
सात्वेवमुक्ता वैदेही अनसूयाऽनसूयया। प्रतिपूज्य वचो मन्दं प्रवक्तुमुपचक्रमे।।2.118.1।।
हिन्दी अर्थ देखें
तपस्विनी अनसूया के इस प्रकार उपदेश देने पर किसी के प्रति दोषदृष्टि न रखने वाली विदेहराजकुमारी सीता ने उनके वचनों की भूरि-भूरि प्रशंसा करके धीरे-धीरे इस प्रकार कहना आरम्भ किया—
Show English Translation
When Anasuya thus addressed Vaidehi who is free from any malice, she worshipped Anasuya and started speaking in a gentle tone.
ShlokaShloka 2
नैतदाश्चर्यमार्याया यन्मां त्वमभिभाषसे। विदितन्तु ममाप्येतद्यथा नार्याः पतिर्गुरुः।।2.118.2।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘देवि! आप संसार की स्त्रियों में सबसे श्रेष्ठ हैं। आपके मुँह से ऐसी बातों का सुनना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। नारी का गुरु पति ही है, इस विषय में जैसा आपने उपदेश किया है, यह बात मुझे भी पहले से ही विदित है
Show English Translation
It is no wonder that a noble lady like you should instruct me this way. It is known to me that a husband is a guru to his wife.
ShlokaShloka 3
यद्यप्येष भवेद्भर्ता ममाऽर्ये वृत्तवर्जितः। अद्वैधमुपचर्तव्यस्तथाप्येष मया भवेत्।।2.118.3।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘मेरे पतिदेव यदि अनार्य (चरित्रहीन) तथा जीविका के साधनों से रहित (निर्धन) होते तो भी मैं बिना किसी दुविधा के इनकी सेवा में लगी रहती
Show English Translation
O noble lady, even if my husband is devoid of good conduct, he should be obeyed without showing any hesitation.
ShlokaShloka 4
किं पुनर्यो गुणश्लाघ्य स्सानुक्रोशो जितेन्द्रियः। स्थिरानुरागो धर्मात्मा मातृवत्पितृवत्प्रियः।।2.118.4।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘फिर जब कि ये अपने गणों के कारण ही सबकी प्रशंसा के पात्र हैं, तब तो इनकी सेवा के लिये कहना ही क्या है। ये श्रीरघुनाथजी परम दयालु, जितेन्द्रिय, दृढ़ अनुराग रखने वाले, धर्मात्मा तथा माता-पिता के समान प्रिय हैं।
Show English Translation
What to speak of a husband if he is worthy of applause for his virtues, is compassionate, a subduer of the senses, righteous and ever affectionate like a mother and a father?
ShlokaShloka 5
यां वृत्तिं वर्तते रामः कौसल्यायां महाबलः। तामेव नृपनारीणामन्यासामपि वर्तते।।2.118.5।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘महाबली श्रीराम अपनी माता कौसल्या के प्रति जैसा बर्ताव करते हैं वैसा ही महाराज दशरथ की दूसरी रानियों के साथ भी करते हैं
Show English Translation
Mighty Rama shows the same behaviour and treatment towards the other consorts of the king as he does towards his own mother Kausalya.
ShlokaShloka 6
सकृद्दृष्टास्वपि स्त्रिषु नृपेण नृपवत्सलः। मातृवद्वर्तते वीरो मानमुत्सृज्य धर्मवित्।।2.118.6।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘महाराज दशरथ ने एक बार भी जिन स्त्रियों को प्रेमदृष्टि से देख लिया है, उनके प्रति भी ये पितृवत्सल धर्मज्ञ वीर श्रीराम मान छोड़कर माता के समान ही बर्ताव करते हैं
Show English Translation
Heroic Rama is affectionate towards king Dasaratha and is conversant with righteousness. Renouncing the sense of selfrespect he honours all the women on whom his father had cast his glance even once just as his own mother.
ShlokaShloka 7
आगच्छन्त्याश्च विजनं वनमेवं भयावहम्। समाहितं मे श्वश्र्वा च हृदये तद्धृतं महत्।।2.118.7।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘जब मैं पति के साथ निर्जन वन में आने लगी, उस समय मेरी सास कौसल्या ने मुझे जो कर्तव्य का उपदेश दिया था, वह मेरे हृदय में ज्यों-का-त्यों स्थिरभाव से अङ्कित है
Show English Translation
When departing for this frightful and desolate forest, the great (advice) imparted by my motherinlaw is firmly fixed in my mind.
ShlokaShloka 8
पाणिप्रदानकाले च यत्पुरात्वग्नि सन्निधौ। अनुशिष्टा जनन्याऽस्मि वाक्यं तदपि मे धृतम्।।2.118.8।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘पहले मेरे विवाह-काल में अग्नि के समीप माता ने मुझे जो शिक्षा दी थी, वह भी मुझे अच्छी तरह याद है।
Show English Translation
When I have been taught by my mother earlier, at the time of bestowal of my hand to Rama in the presence of the sacrificial fire (as witness) is etched in my mind.
ShlokaShloka 9
नवीकृतं तु तत्सर्वं वाक्यैस्ते धर्मचारिणि। पतिशुश्रूषणान्नार्यास्तपो नान्यद्विधीयते।।2.118.9।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘धर्मचारिणि! इसके सिवा मेरे अन्य स्वजनों ने अपने वचनों द्वारा जो-जो उपदेश किया है, वह भी मुझे भूला नहीं है। स्त्री के लिये पति की सेवा के अतिरिक्त दूसरे किसी तप का विधान नहीं है
Show English Translation
O righteous one (Anasuya), after listening to your words the instructions given by my motherinlaw and my mother are renewed (remembered again). For a woman, no other penance is laid down (in scriptures) except service to her husband.
ShlokaShloka 10
सावित्री पतिशुश्रूषां कृत्वा स्वर्गे महीयते। तथावृत्तिश्च याता त्वं पतिशुश्रूषया दिवम्।।2.118.10।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘सत्यवान की पत्नी सावित्री पति की सेवा करके ही स्वर्गलोक में पूजित हो रही हैं। उन्हीं के समान बर्ताव करने वाली आप (अनसूया देवी) ने भी पति की सेवा के ही प्रभाव से स्वर्गलोक में स्थान प्राप्त कर लिया है
Show English Translation
Having served her husband (faithfully), Savitri is honoured in heaven. You also, by following the same path of serving your husband, shall reach the heaven.
ShlokaShloka 11
वरिष्ठा सर्वनारीणामेषा च दिवि देवता। रोहिणी न विनाचन्द्रं मुहूर्तमपि दृश्यते।।2.118.11।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘सम्पूर्ण स्त्रियों में श्रेष्ठ यह स्वर्ग की देवी रोहिणी पतिसेवा के प्रभाव से ही एक मुहूर्त के लिये भी चन्द्रमा से बिलग होती नहीं देखी जाती
Show English Translation
Rohini, the very best among all women and the goddess of heaven, is never seen in the sky separated from the moon even for a moment.
ShlokaShloka 12
एवंविधाश्च प्रवराः स्त्रियो भर्तृदृढव्रताः। देवलोके महीयन्ते पुण्येन स्वेन कर्मणा।।2.118.12।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘इस प्रकार दृढ़तापूर्वक पातिव्रत्य-धर्म का पालन करने वाली बहुत-सी साध्वी स्त्रियाँ अपने पुण्यकर्म के बल से देवलोक में आदर पा रही हैं
Show English Translation
Execellent women such as these, firm in their vows to their husband are highly revered in the world of gods through their own meritorious deeds.
ShlokaShloka 13
ततोऽनसूया संहृष्टा श्रुत्वोक्तं सीतया वचः। शिरस्याघ्राय चोवाच मैथिलीं हर्षयन्त्युत।।2.118.13।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘उत्तम व्रत का पालन करने वाली सीते! मैंने अनेक प्रकार के नियमों का पालन करके बहुत बड़ी तपस्या संचित की है। उस तपोबल का ही आश्रय लेकर मैं तुमसे इच्छानुसार वर माँगने के लिये कहती हूँ
Show English Translation
Thereafter hearing Sita's words, Anasuya affectionately kissed her forehead and said this in order to make her happy:
ShlokaShloka 14
नियमैर्विविधैराप्तं तपो हि महदस्ति मे। तत्संश्रित्य बलं सीते छन्दये त्वां शुचिव्रते।।2.118.14।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘उत्तम व्रत का पालन करने वाली सीते! मैंने अनेक प्रकार के नियमों का पालन करके बहुत बड़ी तपस्या संचित की है। उस तपोबल का ही आश्रय लेकर मैं तुमसे इच्छानुसार वर माँगने के लिये कहती हूँ
Show English Translation
O Sita of pure conduct, I have great ascetic power obtained through practising various austerities. With its strength I shall give what you want for your enjoyment.
ShlokaShloka 15
उपपन्नं मनोज्ञं च वचनं तव मैथिलि। प्रीता चास्म्युचितं किं ते ��रवाणि ब्रवीहि मे।।2.118.15।।
हिन्दी अर्थ देखें
सीता के ऐसा कहने पर धर्मज्ञ अनसूया को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे बोलीं-‘सीते! तुम्हारी निर्लोभता से जो मुझे विशेष हर्ष हुआ है (अथवा तुम में जो लोभहीनता के कारण सदा आनन्दोत्सव भरा रहता है), उसे मैं अवश्य सफल करूँगी
Show English Translation
O Sita, I am glad to hear your befitting and pleasing words. Tell me what appropriate thing you desire and I shall give you.
ShlokaShloka 16
तस्यास्तद् वचनं श्रूत्वा विस्मिता मन्दविस्मया। कृतमित्यब्रवीत् सीता तपोबलसमन्विताम्।।2.118.16।।
हिन्दी अर्थ देखें
सीता के ऐसा कहने पर धर्मज्ञ अनसूया को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे बोलीं-‘सीते! तुम्हारी निर्लोभता से जो मुझे विशेष हर्ष हुआ है (अथवा तुम में जो लोभहीनता के कारण सदा आनन्दोत्सव भरा रहता है), उसे मैं अवश्य सफल करूँगी
Show English Translation
On hearing her words Sita was surprised. With a gentle smile she said, to Anasuya who was endowed with ascetic power, 'I think you have already granted me the boons'.
ShlokaShloka 17
सा त्वेवमुक्ता धर्मज्ञा तया प्रीततराऽभवत्। सफलं च प्रहर्षं ते हन्त सीते करोम्यहम्।।2.118.17।।
हिन्दी अर्थ देखें
सीता के ऐसा कहने पर धर्मज्ञ अनसूया को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे बोलीं-‘सीते! तुम्हारी निर्लोभता से जो मुझे विशेष हर्ष हुआ है (अथवा तुम में जो लोभहीनता के कारण सदा आनन्दोत्सव भरा रहता है), उसे मैं अवश्य सफल करूँगी
Show English Translation
When Sita said so, Anasuya who knew her righteous duty was immensely pleased. and replied, 'What a joy I shall make the words you have spoken come true'.
ShlokaShloka 18
इदं दिव्यं वरं माल्यं वस्त्रमाभरणानि च। अङ्गरागं च वैदेहि महार्हं चानुलेपनम्।।2.118.18।। मया दत्तमिदं सीते तव गात्राणि शोभयेत्। अनुरूपमसंक्लिष्टं नित्यमेव भविष्यति।।2.118.19।।
हिन्दी अर्थ देखें
तदनन्तर इस प्रकार अपने निकट बैठी हुई सीता से दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रत का पालन करने वाली अनसूया ने कोई परम प्रिय कथा सुनाने के लिये इस प्रकार पूछना आरम्भ किया—
Show English Translation
O princess of Videha, O Sita, I bestow on you this best garland of the gods, raiment, jewellery, fragrant unguents, and precious ointment for anointing your body with. All this will beautify your limbs. It is convenient (to use) and will never fade.
ShlokaShloka 19
अङ्गरागेण दिव्येन लिप्ताङ्गी जनकात्मजे। शोभयिष्यसि भर्तारं यथा श्रीर्विष्णुमव्ययम्।।2.118.20।।
हिन्दी अर्थ देखें
तदनन्तर इस प्रकार अपने निकट बैठी हुई सीता से दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रत का पालन करने वाली अनसूया ने कोई परम प्रिय कथा सुनाने के लिये इस प्रकार पूछना आरम्भ किया—
Show English Translation
O daughter of Janaka, you will enhance the glory of your husband by anointing your body with this divine, fragrant unguent to your body like Lakshmi enhancing the glory of eternal Visnu.
ShlokaShloka 20
सा वस्त्रमङ्गरागं च भूषणानि स्रजस्तथा। मैथिली प्रतिजग्राह प्रीतिदानमनुत्तमम्।।2.118.21।।
हिन्दी अर्थ देखें
तदनन्तर इस प्रकार अपने निकट बैठी हुई सीता से दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रत का पालन करने वाली अनसूया ने कोई परम प्रिय कथा सुनाने के लिये इस प्रकार पूछना आरम्भ किया—
Show English Translation
That princess from Mithila accepted the incomparable gifts of love, the raiment, fragrant unguents, jewellery and also the garland.
ShlokaShloka 21
प्रतिगृह्य च तत्सीता प्रीतिदानं यशस्विनी। श्लिष्टाञ्जलिपुटा तत्र समुपास्त तपोधनाम्।।2.118.22।।
हिन्दी अर्थ देखें
तदनन्तर इस प्रकार अपने निकट बैठी हुई सीता से दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रत का पालन करने वाली अनसूया ने कोई परम प्रिय कथा सुनाने के लिये इस प्रकार पूछना आरम्भ किया—
Show English Translation
Illustrious Sita accepted the gifts of love and with palms folded in reverence sat beside her, an ascetic.
ShlokaShloka 22
तथा सीतामुपासीनामनसूया दृढव्रता। वचनं प्रष्टुमारेभे काञ्चित्प्रियकथामनु।।2.118.23।।
हिन्दी अर्थ देखें
तदनन्तर इस प्रकार अपने निकट बैठी हुई सीता से दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रत का पालन करने वाली अनसूया ने कोई परम प्रिय कथा सुनाने के लिये इस प्रकार पूछना आरम्भ किया—
Show English Translation
Anasuya who was firm in her vows commenced to ask Sita this way about a certain tale (that was close to her heart).
ShlokaShloka 23
स्वयं वरे किल प्राप्ता त्वमनेन यशस्विना। राघवेणेति मे सिते कथा श्रुतिमुपागता।।2.118.24।।
हिन्दी अर्थ देखें
तदनन्तर इस प्रकार अपने निकट बैठी हुई सीता से दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रत का पालन करने वाली अनसूया ने कोई परम प्रिय कथा सुनाने के लिये इस प्रकार पूछना आरम्भ किया—
Show English Translation
O Sita, I have heard that you have been won by the illustrious Rama in the swayamvara. At least that is the story which reached my ears.
ShlokaShloka 24
तां कथां श्रोतुमिच्छामि विस्तरेण च मैथिलि। यथाऽनुभूतं कार्त्स्न्येन तन्मे त्वं वक्तुमर्हसि।।2.118.25।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘सीते! इन यशस्वी राघवेन्द्र ने तुम्हें स्वयंवर में प्राप्त किया था, यह बात मेरे सुनने में आयी है
Show English Translation
O daughter of Mithila, I would like to hear the story in detail. You should tell me the whole story as you experienced it.
ShlokaShloka 25
एवमुक्ता तु सा सीता तां ततो धर्मचारिणीम्। श्रूयतामिति चोक्त्वा वै कथयामास तां कथाम्।।2.118.26।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘मिथिलेशनन्दिनि! मैं उस वृत्तान्त को विस्तार के साथ सुनना चाहती हूँ। अतः जो कुछ जिस प्रकार हुआ, वह सब पूर्ण रूप से मुझे बताओ’
Show English Translation
'Listen' said Sita, thus addressed, and began relating the story to Anasuya, a performer of austerities.
ShlokaShloka 26
मिथिलाधिपतिर्वीरो जनको नाम धर्मवित्। क्षत्रधर्मे ह्यभिरतो न्यायतश्शास्ति मेदिनीम्।।2.118.27।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘वे राजा उस क्षेत्र में ओषधियों को मुट्ठी में लेकर बो रहे थे। इतने ही में उनकी दृष्टि मेरे ऊपर पड़ी। मेरे सारे अङ्गों में धूल लिपटी हुई थी। उस अवस्था में मुझे देखकर राजा जनक को बड़ा विस्मय हुआ
Show English Translation
There is a king in Mithila, Janaka by name. He is heroic and is conversant with righteousness. Engaged in the duties of a kshatriya, he is rules the earth with justice.
ShlokaShloka 27
तस्य लाङ्गलहस्तन्य कर्षतः क्षेत्रमण्डलम्। अहं किलोत्थिता भित्वा जगतीं नृपतेस्सुता।।2.118.28।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘वे राजा उस क्षेत्र में ओषधियों को मुट्ठी में लेकर बो रहे थे। इतने ही में उनकी दृष्टि मेरे ऊपर पड़ी। मेरे सारे अङ्गों में धूल लिपटी हुई थी। उस अवस्था में मुझे देखकर राजा जनक को बड़ा विस्मय हुआ
Show English Translation
When he was ploughing the circular plot of land for performing a sacrifice, it is said I emerged from the earth by breaking it and therefore I became his dauhghter.
ShlokaShloka 28
स मां दृष्ट्वा नरपतिर्मुष्टिविक्षेपतत्परः। पांसुकुण्ठितसर्वाङ्गीं जनको विस्मितोऽभवत्।।2.118.29।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘वे राजा उस क्षेत्र में ओषधियों को मुट्ठी में लेकर बो रहे थे। इतने ही में उनकी दृष्टि मेरे ऊपर पड़ी। मेरे सारे अङ्गों में धूल लिपटी हुई थी। उस अवस्था में मुझे देखकर राजा जनक को बड़ा विस्मय हुआ
Show English Translation
Engaged in sowing fistfuls of seeds, king Janaka found me covered with dust and was astonished.
ShlokaShloka 29
अनपत्येन च स्नेहादङ्कमारोप्य च स्वयम्। ममेयं तनयेत्युक्त्वा स्नेहो मयि निपातितः।।2.118.30।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘वे राजा उस क्षेत्र में ओषधियों को मुट्ठी में लेकर बो रहे थे। इतने ही में उनकी दृष्टि मेरे ऊपर पड़ी। मेरे सारे अङ्गों में धूल लिपटी हुई थी। उस अवस्था में मुझे देखकर राजा जनक को बड़ा विस्मय हुआ
Show English Translation
As he had no children, he, on his own accord, lifted me up and placing me on his lap, saying, This is my daughter, he began showering (lots of) love on me.
ShlokaShloka 30
अन्तरिक्षे च वागुक्ताऽप्रतिमाऽमानुषी किल। एवमेतन्नरपते धर्मेण तनया तव।।2.118.31।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘उन दिनों उनके कोई दूसरी संतान नहीं थी, इसलिये स्नेहवश उन्होंने स्वयं मुझे गोद में ले लिया और ‘यह मेरी बेटी है’ ऐसा कहकर मुझ पर अपने हृदय का सारा स्नेह उड़ेल दिया
Show English Translation
'O king, she is an incomparable divine being. By right she is your daughter'. These were the words (Janaka) heard from out of the sky.
ShlokaShloka 31
ततः प्रहृष्टो धर्मात्मा पिता मे मिथिलाधिपः। अवाप्तो विपुलां बुद्धिं मामवाप्य नराधिपः।।2.118.32।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘यह आकाशवाणी सुनकर मेरे धर्मात्मा पिता मिथिला नरेश बड़े प्रसन्न हुए। मुझे पाकर उन नरेश ने मानो कोई बड़ी समृद्धि पा ली थी
Show English Translation
Thereafter, my father and the righteous lord of Mithila was delighted in possessing me when a noble thought struck his mind.
ShlokaShloka 32
दत्ता चास्मीष्टवद्देव्यै ज्येष्ठायै पुण्यकर्मणा। तया सम्भाविता चास्मि स्निग्धया मातृसौहृदात्।।2.118.33।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘यह आकाशवाणी सुनकर मेरे धर्मात्मा पिता मिथिला नरेश बड़े प्रसन्न हुए। मुझे पाकर उन नरेश ने मानो कोई बड़ी समृद्धि पा ली थी
Show English Translation
Bestowed as the choicest one of meritorious acts on the chief queen, I was brought up by her, by nature affectionate, with the love of a mother.
ShlokaShloka 33
पतिसंयोगसुलभं वयो दृष्ट्वा तु मे पिता। चिन्तामभ्यगमद्धीनो वित्तनाशादिवाधनः।।2.118.34।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘जब पिता ने देखा कि मेरी अवस्था विवाह के योग्य हो गयी, तब इसके लिये वे बड़ी चिन्ता में पड़े। जैसे कमाये हुए धन का नाश हो जाने से निर्धन मनुष्य को बड़ा दुःख होता है, उसी प्रकार वे मेरे विवाह की चिन्ता से बहुत दुःखी हो गये
Show English Translation
When my father saw I had attained the marriageable age, he was immersed in sorrow like an indigent man who had lost all his wealth.
ShlokaShloka 34
सदृशाच्चापकृष्टाच्च लोके कन्यापिता जनात्। प्रधर्षणामवाप्नोति शक्रेणापि समो भुवि।।2.118.35।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘जब पिता ने देखा कि मेरी अवस्था विवाह के योग्य हो गयी, तब इसके लिये वे बड़ी चिन्ता में पड़े। जैसे कमाये हुए धन का नाश हो जाने से निर्धन मनुष्य को बड़ा दुःख होता है, उसी प्रकार वे मेरे विवाह की चिन्ता से बहुत दुःखी हो गये
Show English Translation
Even though he was an Indra on earth, as a father of an unmarried girl he would be humiliated by men who are his equal or inferior in this world.
ShlokaShloka 35
तां धर्षणामदूरस्थां दृष्ट्वा चात्मनि पार्थिवः। चिन्तार्णवगतः पारं नाससादाप्लवो यथा।।2.118.36।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘संसार में कन्या के पिता को, वह भूतल पर इन्द्र के ही तुल्य क्यों न हो, वर पक्ष के लोगों से, वे अपने समान या अपने से छोटी हैसियत के ही क्यों न हों, प्रायः अपमान उठाना पड़ता है
Show English Translation
Having perceived that the humiliation is not very far, king Janaka was plunged in a sea of sorrow like one who cannot reach the shore without a float.
ShlokaShloka 36
अयोनिजां हि मां ज्ञात्वा नाध्यगच्छद्विचिन्तयन्। सदृशं चानुरूपं च महीपालः पतिं मम।।2.118.37।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘मुझे अयोनिजा कन्या समझकर वे भूपाल मेरे लिये योग्य और परम सुन्दर पति का विचार करने लगे; किंतु किसी निश्चय पर नहीं पहुँच सके
Show English Translation
The ruler of the earth knew that I was not born from a woman's womb, and could not find a suitable husband for me after deep reflection.
ShlokaShloka 37
तस्य बुद्धिरियं जाता चिन्तयानस्य सन्ततम्। स्वयंवरं तनूजायाः करिष्यामीति धीमतः।।2.118.38।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘मुझे अयोनिजा कन्या समझकर वे भूपाल मेरे लिये योग्य और परम सुन्दर पति का विचार करने लगे; किंतु किसी निश्चय पर नहीं पहुँच सके
Show English Translation
After constantly pondering over the matter, the wise king arrived at the decision to perform a swayamvara for his daughter.
ShlokaShloka 38
महायज्ञे तदा तस्य वरुणेन महात्मना। दत्तं धनुर्वरं प्रीत्या तूणी चाक्षयसायकौ।।2.118.39।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘सदा मेरे विवाह की चिन्ता में पड़े रहने वाले उन महाराज के मन में एक दिन यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं धर्मतः अपनी पुत्री का स्वयं वर करूँगा
Show English Translation
Magnanimous Varuna out of his affection had given him, on the occasion of a great sacrifice, an excellent bow with inexhaustible arrows and a pair of quivers.
ShlokaShloka 39
असञ्चाल्यं मनुष्यैश्च यत्नेनापि च गौरवात्। तन्न शक्ता नमयितुं स्वप्नेष्वपि नराधिपाः।।2.118.40।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘उन्हीं दिनों उनके एक महान् यज्ञ में प्रसन्न होकर महात्मा वरुण ने उन्हें एक श्रेष्ठ दिव्य धनुष तथा अक्षय बाणों से भरे हुए दो तरकस दिये
Show English Translation
Because of its weight, no human could move that bow despite great effort nor were the kings capable of bending it even in their dreams.
ShlokaShloka 40
तद्धनुः प्राप्य मे पित्रा व्याहृतं सत्यवादिना। समवाये नरेन्द्राणां पूर्वमामन्त्र्य पार्थिवान्।।2.118.41।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘उस धनुष को पाकर मेरे सत्यवादी पिता ने पहले भूमण्डल के राजाओं को आमन्त्रित करके उन नरेशों के समूहमें यह बात कही—
Show English Translation
My truthful father, after having acquired the bow, invited all the princes and placed the great bow before them in the assembly where he declared:
ShlokaShloka 41
इदं च धनुरुद्यम्य सज्यं यः कुरुते नरः। तस्य मे दुहिता भार्या भविष्यति न संशयः।।2.118.42।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘उस धनुष को पाकर मेरे सत्यवादी पिता ने पहले भूमण्डल के राजाओं को आमन्त्रित करके उन नरेशों के समूहमें यह बात कही—
Show English Translation
ShlokaShloka 42
तच्च दृष्ट्वा धनुश्श्रेष्ठं गौरवाद्गिरिसन्निभम्। अभिवाद्य नृपा जग्मुरशक्तास्तस्य तोलने।।2.118.43।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘जो मनुष्य इस धनुष को उठाकर इस पर प्रत्यञ्चा चढ़ा देगा, मेरी पुत्री सीता उसी की पत्नी होगी; इसमें संशय नहीं है
Show English Translation
Beholding the mighty bow resembling a mountain in weight, the kings, unable to lift it, paid their homage and left.
ShlokaShloka 43
सुदीर्घस्य तु कालस्य राघवोऽयं महाद्युतिः। विश्वामित्रेण सहितो यज्ञं द्रष्टुं समागतः।।2.118.44।। लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा राम स्सत्यपराक्रमः।
Show English Translation
After a long time, resplendent Rama whose prowess was truth, arrived along with his brother Lakshman and sage Viswamitra in order to witness the sacrifice.
ShlokaShloka 44
विश्वामित्रस्तु धर्मात्मा मम पित्रा सुपूजितः।।2.118.45।। प्रोवाच पितरं तत्र भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ।
हिन्दी अर्थ देखें
‘तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् ये महातेजस्वी रघुकुल-नन्दन सत्यपराक्रमी श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण को साथ ले विश्वामित्रजी के साथ मेरे पिताका यज्ञ देखने के लिये मिथिला में पधारे। उस समय मेरे पिताने धर्मात्मा विश्वामित्र मुनि का बड़ा आदरसत्कार किया
Show English Translation
Having accepted the honour extended by my father, righteous Viswamitra spoke to him about those two brothers, Rama and Lakshmana.
ShlokaShloka 45
सुतौ दशरथस्येमौ धनुर्दर्शकाङ्क्षिणौ। धनुर्दर्शय रामाय राजपुत्राय दैविकम्।।2.118.46।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् ये महातेजस्वी रघुकुल-नन्दन सत्यपराक्रमी श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण को साथ ले विश्वामित्रजी के साथ मेरे पिताका यज्ञ देखने के लिये मिथिला में पधारे। उस समय मेरे पिताने धर्मात्मा विश्वामित्र मुनि का बड़ा आदरसत्कार किया
Show English Translation
'Both these sons of king Dasaratha wish to see the bow. Show the divine bow to prince Rama'.
ShlokaShloka 46
इत्युक्तस्तेन विप्रेण तद्धनुस्समुपानयत्।।2.118.47।। निमेषान्तरमात्रेण तदाऽनम्य महाबलः। ज्यां समारोप्य झडिति पूरयामास वीर्यवान्।।2.118.48।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘विप्रवर विश्वामित्र के ऐसा कहने पर पिताजी ने उस दिव्य धनुष को मँगवाया और राजकुमार श्रीराम को उसे दिखाया
Show English Translation
At the words of that ascetic, my father brought out the bow. Mighty and valiant Rama bent it and strung it and drew it in the twinkling of an eye.
ShlokaShloka 47
तेन पूरयता वेगान्मध्ये भग्नं द्विधा धनुः। तस्य शब्दो भवद्भीमः पतितस्याशनेरिव।।2.118.49।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘विप्रवर विश्वामित्र के ऐसा कहने पर पिताजी ने उस दिव्य धनुष को मँगवाया और राजकुमार श्रीराम को उसे दिखाया
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When Rama was stringing the bow with force, it was broken into two in the middle and fell down with a dreadful sound like that of thunder.
ShlokaShloka 48
ततोऽहं तत्र रामाय पित्रा सत्याभिसन्धिना। निश्चिता दातुमुद्यम्य जलभाजनमुत्तमम्।।2.118.50।।
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‘महाबली और परम पराक्रमी श्रीराम ने पलक मारते-मारते उस धनुष पर प्रत्यञ्चा चढ़ा दी और उसे तुरंत कान तक खींचा
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Then, my father steadfast in truth, held a vessel of pure water and declared his decision to offer me to Rama.
ShlokaShloka 49
दीयमानां न तु तदा प्रतिजग्राह राघवः। अविज्ञाय पितुश्छन्दमयोध्याऽधिपतेः प्रभोः।।2.118.51।।
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“उनके वेगपूर्वक खींचते समय वह धनुष बीच से ही टूट गया और उसके दो टुकड़े हो गये। उसके टूटते समय ऐसा भयंकर शब्द हुआ मानो वहाँ वज्र टूट पड़ा हो
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Then Rama did not accept the offer of my father straightaway before he knew the opinion of his father Dasaratha, king of Ayodhya.
ShlokaShloka 50
तत श्श्वशुरमामन्त्र्य वृद्धं दशरथं नृपम्। मम पित्रा त्वहं दत्ता रामाय विदितात्मने।।2.118.52।।
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‘उस समय अपने पिता अयोध्यानरेश महाराज दशरथ के अभिप्राय को जाने बिना श्रीराम ने राजा जनक के देने पर भी मुझे नहीं ग्रहण किया
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Thereafter, my fatherinlaw, the aged king Dasaratha was invited and my father offered me to Rama known for his sagacity.
ShlokaShloka 51
मम चैवानुजा साध्वी ऊर्मिला प्रियदर्शना। भार्यार्थे लक्ष्मणस्यापि दत्ता पित्रा मम स्वयम्।।2.118.53।।
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‘उस समय अपने पिता अयोध्यानरेश महाराज दशरथ के अभिप्राय को जाने बिना श्रीराम ने राजा जनक के देने पर भी मुझे नहीं ग्रहण किया
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My father, on his own accord, bestowed Urmila, my younger sister of chaste and of pleasing appearance as wife to Lakshmana.
ShlokaShloka 52
एवं दत्ताऽस्मि रामाय तदा तस्मिन्स्वयंवरे। अनुरक्ताऽस्मि धर्मेण पतिं वीर्यवतां वरम्।।2.118.54।।
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‘तदनन्तर मेरे बूढ़े श्वशुर राजा दशरथ की अनुमति लेकर पिताजी ने आत्मज्ञानी श्रीराम को मेरा दान कर दिया
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In this way my father bestowed me on Rama in that swayamvara and I remain devoted to my husband who is the foremost among the valiant in treading the path of righteousness. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे अष्टादशोत्तरशततमस्सर्गः। Thus ends the one hundredeighteenth sarga in Ayodhyakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.